अवधेश बाजपेयी जब चार-पांच वर्ष आयु के थे, उस समय वे गांव में घर में मां के साथ अन्य महिलाओं के साथ ...

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  1. अवधेश बाजपेयी की चित्रकला में डाट‍िज़्म की अद्भुत अवधारणा
  2. साज का सुर मिलाने की तरह इस जनम में नर्मदा परिक्रमा का सुर मिलाते रहे : अमृतलाल वेगड़ अगले जनम में नर्मदा परिक्रमा करने की इच्छा
  3. रघुवीर यादव की न्यूटन से जबलपुर की आस आस्कर अवार्ड से जुड़ी
  4. जबलपुर की हॉकी और ओलंपिक का 88 वर्ष पुराना है रिश्ता
  5. डा. संदीप जैन कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित
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अवधेश बाजपेयी की चित्रकला में डाट‍िज़्म की अद्भुत अवधारणा


अवधेश बाजपेयी जब चार-पांच वर्ष आयु के थे, उस समय वे गांव में घर में मां के साथ अन्य महिलाओं के साथ बैठे हुए थे। दोपहर बाद के समय में बड़े भाई ने स्लेट में चाक बत्ती से एक चित्र बनाया। वे वहां से जैसे ही गए, अवधेश ने उसी स्लेट पर, वही चित्र फिर से बना दिया। उन्होंने स्वयं का स्लेट में बनाया चित्र सभी को दिखाया। सभी ने एक स्वर में कहा कि अवधेश ने तो अपने बड़े भाई से भी अच्छा चित्र बना दिया। उस समय अवधेश बाजपेयी यह जानते ही नहीं थे क‍ि चित्र बनाना भी कला है। चित्रकला की यहीं से अवधेश बाजपेयी की शुरूआत थी। उन्होंने तब से चित्र बनाना जो शुरू किया, वह आज तक जारी है। उनके पास का चयन का कोई प्रश्न नहीं था और चि‍त्र बनाना अवधेश बाजपेयी का स्वभाव बन गया। उन्होंने चित्रकला के आकर्षण के संबंध में बहुत बाद में जाना और तक वे इसमें पूरी तरह डूब चुके थे। आर्ट स्कूल में दाखि‍ला लेते समय अवधेश बाजपेयी को मनुष्य के अंतर्द्वंद शुरू से आकर्ष‍ित करते थे और प्रकृत‍ि, प्रकृति रहस्य व सामाजिक विषमताएं उनके चित्र के विषय बनने लगे।
अवधेश बाजपेयी स्वीकारते हैं क‍ि चित्रकला का व्यवस्थि‍त अध्ययन जरूरी है। इसके साथ ही वे यह मानते हैं क‍ि इसके लिए अच्छे श‍िक्षक या गुरू मिलना भी जरूरी है। वे चित्रकला की अकादमिक व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं। वे कहते हैं क‍ि चित्रकला श‍िक्षण में वीरनागी है।
दुनिया के चित्रकारों की यात्रा मूर्त से ही आरंभ हुई है। वैसे ही प्रयोगधर्मी चित्रकार अवधेश बाजपेयी की यात्रा है। अवधेश बाजपेयी का मानना है क‍ि मूर्त व अमूर्त दोनों ही कला के महत्वपूर्ण तत्व हैं। मूर्त व अमूर्त चित्रों में, दोनों में आकृत‍ि रहती है। एक में आकृति पहचान में आती है, दूसरे में कहीं-कहीं पहचान में आती है। अवधेश बाजपेयी का इस संदर्भ में कहना है क‍ि क‍िसी भी कला में लगातार रहने व बसने से कलाकार व कला प्रेमी दोनों का रूपांतरण होता है।
 अवधेश बाजपेयी कैनवास, ब्रश (तूलिका) व रंगों के मध्य अद्भुत संतुलन रखते हैं। उनका कहना है क‍ि चित्रकार सांस हैं, तो कला माध्यम शरीर। सांस व शरीर के तालमेल की तरह वे चित्रकला में ब्रश व रंगों का संतुलन करना बनाए रखना बेहतर मानते हैं। उनका मानना है क‍ि चित्रकला में आकार, रंगों के साथ ज्ञानतत्व का होना आवश्यक है।
चित्रों के जरिए रंगों के संसार में रहने वाले अवधेश बाजपेयी ने रंगों का मनोविज्ञान पढ़ा नहीं है और न ही वे इस विषय में पढ़ना चाहते हैं। वे कहते हैं क‍ि सभी लोग हर पल रंगों के साथ रहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण रंग मनुष्य के शरीर का है। अवधेश बाजपेयी को म‍िट्टी के रंग आकर्ष‍ित करते हैं। उनका विचार है क‍ि चटख रंग बहुत ही सीमित दायरे में होते हैं। वे पेड़ व शरीर की तुलना करते हुए कहते हैं क‍ि बड़े पेड़ में जिस तरह थोड़े फूल होते हैं, वैसे ही पूरे शरीर में आंख या मुस्कराहट फूल की भांति हैं। अवधेश बाजपेयी का यह महत्वपूर्ण दृष्ट‍िकोण है क‍ि चित्रों में रंग ही सब कुछ नहीं होता। रंग एक पुर्जा है, शेष और भी बहुत से तत्व होते हैं।
अवधेश बाजपेयी की चित्रकला में साल दर साल व्यापक बदलाव आया है। यह परिवर्तन उन्होंने समझदारी से अपनाया है। वे कहते हैं क‍ि कला में ईमानदारी की समझ श्वांस की तरह होती है। दुनिया यदि समझ के साथ विकसित हो रही है, तो उसी प्रकार कला भी समझ के साथ विकसित होती है। सृजनात्मक तत्व वही है ,जो पहले थे, उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ। कला को समझने के संसार की संरचना की समझ जरूरी है। अवधेश कहते हैं क‍ि चित्रकला में बदलाव के स्थान पर रूपांतरण या ट्रांसफार्मेशन शब्द ज्यादा सटीक है। कला के विकास के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होते हैं, क्योंक‍ि चीजें तो हमेशा मौजूद रहती हैं, परन्तु दृष्ट‍ि का विकास करना होता है। इसके लिए विश्व के महान साहित्य, शि‍ल्प, कला, संगीत, फ‍िल्म, वास्तुश‍िल्प आदि को पढ़, देख व सुन कर लगातार सीखते रहते हैं।
अवधेश बाजपेयी की चित्रकला में डाट‍िज़्म की अवधारणा अद्भुत है। वे कहते हैं क‍ि जब स्कूल में पहली बार रेखा की परिभाषा पढ़ी कि बहुत सी बिन्दुओं से मिल कर रेखा बनती है, तभी से, जब भी रेखा चित्र बनाते बिन्दु की अवधारणा साथ रहती, फ‍िर बाद में जाकर वॉन गाग के समकालीन चित्रकार जार्ज स्यूरेट के बिन्दुवादकी अवधारणा जुड़ गई। इसके दायरे में हर चित्रकार ने कुछ न कुछ चित्रित किया। चित्र संरचना की बिंदु (डाट) या ब‍िंदी की अवधारणा सभी चित्रकारों के लिए अलग-अलग है। अवधेश बाजपेयी ने चित्रकार के रूप में शुरूआती दिनों में इस अवधारणा को समझ लिया था। जब उन्होंने भारतीय, आस्ट्रेलियन, आफ्रि‍कन, लेटिन अमेरिकन आदिवसाी चित्रकला देखी तो उनके भीतर के रचना संसार में खलबची मच गई। उस समय अवधेश बाजपेयी का कार्य क्षेत्र दमोह (बुंदेलखंड) था। बुंदेलखंड के राई नृत्य की प्रस‍िद्ध‍ि विश्व में है। राई आकार की दृष्ट‍ि से सबसे गतिवान बीज है और राई नृत्य भी वृत्तीय गति के साथ उन्मुक्त नृत्य है। यहां से अवधेश बाजपेयी बिन्दु पर आए। इस तरह उनका बिन्दु या पाइंट थ्री डी में आया। अवधेश बाजपेयी ने गूगल में खोज डाला क‍ि किन च‍ित्रकारों ने थ्री डी में बिन्दु लगाए हैं ? इस खोज के जरिए उन्हें जानकारी मिली क‍ि च‍ित्रकारों ने टू डी में बिन्दु लगाए हैं। इसके पश्चात् अवधेश बाजपेयी का बिन्दु मध्यप्रदेश की आद‍िवासी कला से जुड़ गया। फ‍िर इस बिन्दु का आधुनिकता की ओर रूपांतरण हुआ। उनके अनुसार बिन्दु की अवधारणा सिर्फ आकार नहीं है,समय है और घटना है। अवधेश बाजपेयी के च‍ित्र में प्रयुक्त हुआ ब‍िन्दु लम्बा, मोटा, ऊंचा, खुरदरा, आकृतिपूर्ण हर प्रकार का होता है। उन्हें महान च‍ित्रकार कांद्व‍िस्की का वक्तव्य हर समय याद आता है-‘’हर आकृति बिन्दु से प्रारंभ होती है और बिन्दु में ही उसका अंत होता है।‘’ अवधेश बाजपेयी की च‍ित्रकला में बिन्दु केन्द्र नहीं है, बल्क‍ि एक ह‍िस्सा है, टूल है, जिसका वे जरूरत पड़ने पर उपयोग करते हैं। बिन्दु ने उनको इसलिए आकर्ष‍ित किया, क्योंक‍ि यह अपने आप में पूर्ण आकृति है। बिन्दु प्रकृति जन्य है और वृत्त को छोड़ कर त्रिभुज व चतुर्भुज मनुष्य जन्य है। उनका मानना है क‍ि बिन्दु को जहां भी स्थापित कर दें, यह पूरे क्षेत्र व पर्यावरण को अपनी ज़द में ले लेती है। इसके लिए वे आकाश में शुक्र तारा या सूरज का उदाहरण देते हैं। अवधेश बाजपेयी को बिन्दु कई कारणों से आकर्ष‍ित करती है। भौतिक व‍िज्ञान में हर कण स्वतंत्र होता है और आश्र‍ित भी। उनका विस्तार सूक्ष्मता की ओर है, न क‍ि विराट की ओर। वे छोटे-छोटे च‍ित्र बनाना चाहते हैं। भविष्य में हम सभी लोग उनके बनाए गए लघु च‍ित्र शीघ्र देख सकेंगे।
अवधेश बाजपेयी के अनुसार कोई भी कला प्रगतिशील व जनवादी ही होती है, यद‍ि नहीं तो वह कला के अलावा कुछ और है। कला समय के साथ परिवर्तित व रूपांतरित होती रहती है। जब कबीर बोल या रच रहे थे, तब उनके पास प्रगतिशील व जनवादी जैसी कोई अवधारणा नहीं थी। यह अवधारणाएं हम लोगों ने प्रति‍पादित की है। इसका कोई औच‍ित्य नहीं है। कला जब मनुष्य के दुख, करूणा, संघर्ष, प्रेम, विकास पर केन्द्रि‍त होती है, तब यह स्वाभाव‍िक रूप से जनवादी या प्रगतिशील हो जाती है।
अवधेश बाजपेयी की च‍ित्रकला में पूर्णता की कोई अवधारणा नहीं है। उनके ल‍िए पूर्णता एक अनवरत खोज है। वे कहते हैं क‍ि पूरी पृथ्वी या धरती में व‍िचरण करना, जहां  प्रकृति है, हर ह‍िस्सा आप को रोमांचकारी, सौन्दर्यकारी, व‍िस्मय करने वाला होता है। ऐसी दुनिया में विचरण करना मुश्क‍िल काम है। तब च‍ित्रकार के रूप में वे अपने कैनवास में व‍िचरण करते हैं। खुशी व अवसाद के क्षणों आते-जाते रहते हैं। सब कुछ एक साथ झेलना पड़ता है। यह कष्टकारी और आल्हाद‍ित करने वाला भी होता है। इन्हीं के बीच कभी-कभी कोई रचना सामने आती है, वह भी कुछ देर के लिए। जीवन की श्वांस की तरह यह क्रम चल रहा है और पूर्णता की खोज भी उसके साथ चल रही है।                   
अवधेश बाजपेयी कला बाज़ार की शर्तों से प्रभावित होते भी हैं और नहीं भी। उनका मानना है क‍ि बाज़ार से संघर्ष एक बड़ा संघर्ष है। बाज़ार वही चाहता है, जो बिक सके। बाज़ार को नया दर्शन नहीं, बल्क‍ि नई डिजाइन की जरूरत है।
अवधेश बाजपेयी कला बाज़ार की गहराई जा कर कहते हैं क‍ि कला बाज़ार का अर्थ सिर्फ पेंट‍िंग नहीं है। कला बाज़ार का अर्थ है, जब बच्चा गर्भ में होता है, तब स्त्री को पेंट‍िंग करना चाह‍िए। इसी तरह कार्पोरेट कार्मिकों को भी अपनी क्षमता बढ़ाने और स्वास्थ्य लाभ के लिए पेंट‍िंग करना चाहिए। वर्तमान में करोड़ो रूपयों का विश्व कला बाज़ार है। पूरा समाज अपने जीवन में कला के बिना नहीं रह पाता है। दैनिक जीवन के उपयोग की सभी वस्तुएं कलाकारों के आंशि‍क योगदान से निर्मित हैं। हम सभी चौबीस घंटे कला के दायरे में रहते हैं। अध्यात्मि‍क व भौतिक कला के संबंध में लगातार बातचीत संभव है।
अवधेश बाजपेयी को कहने में यह कहने में बिल्कुल संकोच नहीं है क‍ि वैश्वीकरण का सर्वाध‍िक लाभ कला को मिला है। वे कहते हैं क‍ि पूरा संसार हमारे जेब में आ गया है। पहले चित्रकारों को कला से संबंध‍ित पुस्तकों को पढ़ने व चित्रों को देखने के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जाना पड़ता था। वॉन गाग, पिकासो, डाली की डाक्यूमेंट्री या अन्य क्लासि‍क फ‍िल्में देखने को मिली तो अद्भुत लगता था, जो यहां गांव-कस्बों में संभव नहीं था। अब हम विश्व के हर चित्रकार के काम व हर गैरली को देख सकते हैं। वैश्वीकरण के कारण सभी क्षेत्रों में ज्ञान अर्जित करने के नए रास्ते खुले हैं। अवधेश बाजपेयी इसके साथ ही इस खतरे की ओर भी संकेत करते हैं क‍ि क्या देखना है और क्या नहीं देखना है, इस ओर भी सतर्क रहना होगा। भविष्य में इससे अराजक स्थि‍ति उत्पन्न हो सकती है और इससे संकट भी होगा।                 

 
    

साज का सुर मिलाने की तरह इस जनम में नर्मदा परिक्रमा का सुर मिलाते रहे : अमृतलाल वेगड़ अगले जनम में नर्मदा परिक्रमा करने की इच्छा


‘’अगर सौ साल बाद क‍िसी को एक दंपत‍ि नर्मदा परिक्रमा करता द‍िखाई दे, पति के हाथ में झाड़ू हो और पत्नी के हाथ में टोकरी और खुरपी, पति घाटों की सफाई करता हो और पत्नी कचरे को ले जा कर दूर फेंकती हो और दोनों वृक्षारोपण भी करते हों, तो समझ लीजिए क‍ि वे हमीं हैं-कान्ता और मैं। कोई वादक बजाने से पहले देर तक अपने साज का सुर म‍िलाता है, उसी प्रकार इस जनम में तो हम नर्मदा परिक्रमा का सुर ही मिलाते रहे। परिक्रमा तो अगले जनम से करेंगे।‘’ यह पंक्त‍ियां विख्यात कलाकार, लेखक व नर्मदा यायावर अमृतलाल वेगड़ की हैं। इन पंक्त‍ियों से समझा जा सकता है क‍ि अमृतलाल वेगड़ का नर्मदा नदी से क‍ितना जुड़ाव व लगाव था। उन्होंने अपनी मृत्यु से पूर्व नर्मदा परिक्रमा से सुर म‍िलाया, लेकिन उनकी इच्छा या अंतिम इच्छा भी कह सकते हैं क‍ि अगले जन्म में भी वे पत्नी सहित नर्मदा से जुड़ाव चाहते थे। अमृतलाल वेगड़ के समस्त सृजन का आधार नर्मदा थी। नर्मदा ने उनकी कला को नया आयाम द‍िया था। वे कहते थे क‍ि उन्होंने पिछले चालीस वर्षों से अध‍िक समय से नर्मदा के राश‍ि-राश‍ि सौंदर्य में से अंजुरी भर सौंदर्य ही पाया है। इस अंजुरी भर सौंदर्य को वे च‍िड़ी का चोंच भर पानीकहते थे। वे अपनी नर्मदा परिक्रमा को धार्मिक नहीं बल्क‍ि सांस्कृतिक मानते थे। उनका कहना था क‍ि संसार में एकमात्र नर्मदा ही ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा करते समय नर्मदा हमेशा दाहिने हाथ पर रहनी चाहिए। अत: उत्तर तट पर चलने वाला परकम्मावासीअमरकंटक (उद्गम) और दक्ष‍िण तट पर चलने वाला विमलेश्वर (समुद्र) की ओर जा सकता है। अमृतलाल वेगड़ का मानना था क‍ि नर्मदा मध्यप्रदेश और गुजरात को मिला प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान है।        
अमृतलाल वेगड़ को सभी एक कलाकार, लेखक और नर्मदा यायावर के रूप में जानते व पहचानते हैं। उनकी पांच वर्ष तक शांत‍िनिकेतन में श‍िक्षा-दीक्षा हुई। उन्हें प्रकृत‍ि के सौंदर्य को देखने की दृष्ट‍ि शांत‍िनिकेतन से म‍िली, व‍िशेष रूप से गुरू नन्दलाल वसु से। गुरू ने अमृतलाल वेगड़ को जाते वक्त श‍िक्षा दी क‍ि जीवन में सफल मत होना, अपना जीवन सार्थक करना। गुरू की श‍िक्षा और स्वयं की दृढ़ता से उन्होंने नर्मदा व उसकी सहायक नदियों की 4000 किलोमीटर से भी अध‍िक की पदयात्रा की। वे संभवत: पहले ऐसे चित्रकार व लेखक थे, जो खतरनाक शूलपाण की झाड़ी में गए थे।  
अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा यायावरी के दौरान सबसे पहले प्रकृति सौंदर्य, मानवता का सहज सौंदर्य, रेखांकन, कोलाज और लेखन को नई दृष्ट‍ि से देखा। अमृतलाल वेगड़ ने वर्ष 1977 में पहली नर्मदा पदयात्रा के अनुभव का रेखांकन किया। उनके अध‍िकांश रेखांकन छोटे व प्राय: पोस्टकार्ड साइज के थे। वे अक्सर कहा करते थे क‍ि उनके पास अभि‍व्यक्त‍ि का विलक्षण माध्यम-रेखांकन है। वे रेखाओं से उस सौंदर्य को व्यक्त करते थे, जो शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं हो सकते। जहां शब्द मौन हो जाते हैं, रेखाएं बोल उठती थीं। वे कहते थे क‍ि उनके द्वारा बनाए गए रेखांकन नर्मदा से मिले अनमोल उपहार हैं। 
अमृतलाल वेगड़ की श‍िक्षा-दीक्षा जल रंगों (वाटर कलर) से हुई, लेकिन उन्होंने नर्मदा के सौंदर्य व जीवन को उभारने के लिए कोलाज को माध्यम बनाया। कोलाज अपनी कला अभ‍िव्यक्त‍ि के लिए सही माध्यम लगता था। कोलाज यानी क‍ि कुछ भी च‍िपका कर बनाई गई कलाकृति। उनके कोलाज चित्र जैसे लगते थे। कुछ कोलाज जल रंग की तरह, कुछ आइल कलर की तरह तो कुछ श‍िल्प जैसे। अमृतलाल वेगड़ को कोलाज बनाने में सभी माध्यमों का आनंद मिलता था। उनके चित्रों के विषय नदी, नदी के मोड़, नदी के घाट, नदी को पार करते ग्रामीण बैगा, गोंड, भील, आग तापते ग्रामीण, ग्रामीण गायक, पंडे-पुरोहित, नाई, चक्की पीसती या मूसल चलाती महिलाएं थीं। वे अपने चित्रांकन व कोलाज को चिड़ी का चोंच भर पानीकहते थे।
अमृतलाल वेगड़ को मॉडर्न आर्ट पसंद था, लेकिन वह उनका रास्ता नहीं था। वे मानते थे क‍ि मॉडर्न आर्ट वैश्व‍िक है, लेकिन स्वयं की कला को देश की माटी की गंध मानते थे। कला के लिए कलावाला रास्ता उनका नहीं था। अमृतलाल वेगड़ की कला नर्मदा के लिए थी। वे अपने चित्रों में नर्मदा को और नर्मदा तट के जनजीवन द‍िखाना चाहते थे, इसलिए उनकी कला अमूर्त नहीं थी। उनकी कोश‍िश रहती थी क‍ि च‍ित्र ऐसे बने, जो देखने के लिए बाध्य करें और थोड़ा बहुत रस भी मिले।
अमृतलाल वेगड़ ने अपनी अंतिम व चौथी पुस्तक ‘’नर्मदा तुम क‍ितनी सुंदर होउन महान ऋष‍ियों को समर्प‍ित की जिन्होंने नर्मदा तट पर तपस्या कर के उसे तपोभूमि नर्मदा बनाया। उन्होंने सबसे पहले 1992 में नर्मदा के सौंदर्य को पुस्तक का रूप दिया। उनकी सहज व सरल भाषा ने पाठक को सहयात्री बना देती है। वे नर्मदा को स‍िर्फ जलधारा नहीं मानते हैं, बल्क‍ि उसके साथ जीवन, जीव, वनस्पति, प्रकृति, खेत, पक्षी व मानव सभी को आपस में इस प्रकार जोड़ देते हैं, ज‍िससे नर्मदा एक नदी नहीं, मनुष्य के जीवन से मृत्यु तक का आधार बन जाती है। सौंदर्य की नदी नर्मदा के पश्चात् उनकी तीन पुस्तकें अमृतस्य नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा और नर्मदा तुम क‍ितनी सुंदर हो प्रकाशि‍त हुईं हैं। उनकी अंतिम पुस्तक नर्मदा तुम क‍ितनी सुंदर हो में शब्द नाम मात्र के हैं और पूरी पुस्तक कोलाज व रेखांकन से समृद्ध है। इन्हीं पुस्तकों में कहीं अमृतलाल वेगड़ य‍ह जिक्र करते हैं क‍ि यह तो अध‍िक से अध‍िक परिक्रमा की इंटर्नश‍िप की है, परिक्रमा तो वे अगले जन्म में करेंगे। उनकी पुस्तक तीरे-तीरे नर्मदा को बीबीसी वर्ष 2013 में हिन्दी के 10 श्रेष्ठ यात्रा संस्मरण में चुना था। वर्ष 2004 में अमृतलाल वेगड़ को सौंदर्यनी नदी नर्मदाशीर्षक की हिन्दी से गुजराती में अनुवादित पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्रदान किया गया।
सहज, सरल, विनोदप्रिय व गज़ब का सेंस ऑफ ह्यूमर रखने वाले अमृतलाल वेगड़ व उनका संयुक्त परिवार वर्तमान समाज में उत्कृष्ट उदाहरण है। जीवन भर वे खादी पहनते रहे। घर में चक्की में गेहूं पीसा जाता था। वे पैदल चलने को प्राथमिकता देते थे और जीवन में उन्होंने कभी चाय का सेवन नहीं क‍िया। आश्यर्च होता है क‍ि इतनी व‍िशेषता रखने वाले नर्मदा यायावर अमृतलाल वेगड़ ने जीवन में कभी नर्मदा व‍िस्थापन व इससे संबद्ध आंदोलन पर एक शब्द भी नहीं बोला। नौवे दशक में द‍िए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने बड़े बांधों का समर्थन किया था। वे यात्रा पर निकलते समय हर बार कहते थे-‘’नर्मदा ! तुम सुंदर हो, अत्यंत सुंदर। अपने सौंदर्य का थोड़ा सा प्रसाद मुझे दो, ताक‍ि मैं उसे दूसरों तक पहुंचा सकूं।‘’ न‍िश्च‍ित ही अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा से जो थोड़ा प्रसाद पाया, उसे उन्होंने देश नहीं बल्क‍ि विदेश तक असंख्य लोगों तक शब्द व कला के माध्यम से पहुंचाया। उसी नर्मदा तट पर गोधूलि बेला में उनको व‍िदाई दी गई। इस जन्म में वे नर्मदा परिक्रमा का सुर मिलाते रहे। उनका अगला जनमहोगा फ‍िर एक बार नर्मदा परिक्रमा करने के लिए।

 
    

रघुवीर यादव की न्यूटन से जबलपुर की आस आस्कर अवार्ड से जुड़ी

रघुवीर यादव की न्यूटन फिल्म से जबलपुर आस्कर अवार्ड से जुड़ गया है। न्यूटन इस वर्ष आस्कर अवार्ड के लिए भारत की अध‍िकारिक प्रव‍िष्ट‍ि है। रघुवीर यादव की इस फ‍िल्म से भारत ही नहीं बल्क‍ि जबलपुर की आस भी आस्कर अवार्ड से जुड़ गई है। जबलपुर के मूल निवासी रघुवीर यादव प्रत्येक वर्ष दीपावली पर यहां करौंदी स्थि‍त घर में आते हैं, लेकिन इस वर्ष वे दीपावली में स‍िक्क‍िम में थे। मुंबई से उन्होंने बातचीत में कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस वर्ष न्यूटनआस्कर अवार्ड में भारत के लि‍ए उपलब्ध‍ि हासि‍ल करेगी और भारतीय फिल्म उद्योग के लिए नए अध्याय की शुरूआत होगी। रघुवीर यादव ने कहा कि अब कंटेंट बेस्ड सि‍नेमा ही पनपेगा। अमित मसुरकर निर्देशि‍त न्यूटन एक ब्लेक कॉमेडी फिल्म है, जो भारतीय चुनाव प्रणाली पर कड़क व्यंग्य कसती है। न्यूटनकी सफलता पर रघुवीर यादव ने कहा कि स्टारों की फिल्में असफल हो रही हैं। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि आप हर समय दर्शकों को बेवकूफ नहीं बना सकते। दर्शक अब बुद्धि‍मान है, वह अच्छी व बुरी फिल्म में अंतर करने लगा है।        
रघुवीर यादव एक फिल्म अभ‍िनेता, एक थ‍ि‍एटर आर्टिस्ट,एक गायक, एक संगीतकार और एक सेट डिजाइनर के रूप में हमारे सामने आते हैं और बहुमुखी प्रतिभा से समय-समय पर अवगत करवाते हैं। लगभग तीन दशक से अभ‍िनय कर रहे 60 वर्षीय रघुवीर यादव, एकमात्र बालीवुड अभ‍िनेता हैं, जिनकी आठ फिल्मों ने सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की केटेगरी में भारत का प्रत‍िध‍ित्व किया है। इन फिल्मों ने आस्कर में अलबत्ता कोई अवार्ड तो नहीं जीता, लेकिन दो फिल्में सलाम बॉम्बे (वर्ष 1988) एवं लगान ( वर्ष 2001) नामांकन में अंतिम पांच फिल्मों की दौड़ तक अवश्य पहुंची हैं।
रघुवीर यादव की न्यूटन इस वर्ष 26 फिल्मों (जिसमें बाहुबली-दो भी थी) को पीछे छोड़ कर आस्कर अवार्ड के चुनी गई है। इससे पहले रघुवीर यादव की सात फिल्मों-सलाम बॉम्बे (वर्ष 1988) रूदाली (वर्ष 1993), बेंडिट क्वीन (वर्ष 1994), 1947 अर्थ (वर्ष 1998), लगान (वर्ष 2001), वाटर (वर्ष 2005) और पीपली लाइव (वर्ष 2010) ने आस्कर अवार्ड में भारत का प्रत‍िन‍ित्व किया है।
पचास वर्ष पूर्व घर से भागने वाले रघुवीर यादव ने कभी भी अवार्ड को ध्यान में रख कर अभ‍िनय नहीं किया। वे प्रत्येक फिल्म में अपनी भूमिका पर एकाग्रचित हो कर काम करते हैं। रघुवीर यादव की आस्कर अवार्ड के लिए भेजी गई आठ फिल्मों में उनकी भूमिका कहीं छोटी तो कहीं बड़ी थी, लेकिन वे सलाम बॉम्बे में ड्रग एड‍िक्ट की चिलम और लगान की भूरा की भूमिका को याद करते हैं और उन्हें अविस्मरणीय मानते हैं। धूम्रपान न करने वाले रघुवीर यादव ने सलाम बॉम्बे ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाने के लिए कई ड्रग एडि‍क्टों का आर्ब्जवेशन किया और एक वर्कशाप में भाग लिया था। वैसे उन्हें भूमिका की मांग के अनुरूप कभी सिगरेट या बीड़ी पीना पड़े तो उन्हें धूम्रपान करना मुश्किल लगता है। 

     
 
    

जबलपुर की हॉकी और ओलंपिक का 88 वर्ष पुराना है रिश्ता


पश्चि‍म मध्य रेल जबलपुर की महिला हॉकी ख‍िलाड़ी सुनीता लाकड़ा को रियो ओलंपिक में भाग लेने वाली की भारत की महिला हॉकी टीम में शामिल करने से हॉकी जगत में खुशी की लहर फैल गई है। जबलपुर और ओलंपिक का रिश्ता फिर एक बार जुड़ने जा रहा है। जबलपुर देश का सबसे पुराना हॉकी का गढ़ रहा है। जबलपुर में हॉकी को परिचित करवाने का श्रेय ब्रिटिश ऑर्मी है। 19 वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ऑर्मी ने हॉकी से स्थानीय नागरिकों को परिचित करवाने के पश्चात् भारतीय व एंग्लो-इंडियन समाज ने हॉकी खेलने की शुरूआत की। ओल्ड राबर्टसन कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य सर हेनरी शार्प ने 1894 में हॉकी को व्यवस्थि‍त रूप दिया। सन् 1900 में दो क्लब बनाए गए। सिटी स्पोर्ट्स व केंटोमेंट स्पोर्ट्स हॉकी क्लब के पश्चात् 20 वीं श्ताब्दी की शुरूआत के पहले दशक में पुलिस विभाग ने हॉकी को अपनाया। उस समय जबलपुर में ऑर्मी की दो प्रसिद्ध बटॉलियन 33 पंजाबीस् व फर्स्ट ब्राम्हण का डेरा जबलपुर में था और इनका नेतृत्व मेजर फेल्ट एवं सूबेदार बाले तिवारी कर रहे थे। याद रहे कि बाले तिवारी हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के गुरू थे। ध्यानचंद के अनुज रूप सिंह का जन्म सन् 1909 में जबलपुर में ही हुआ था। उस समय नन्हें ध्यानचंद जबलपुर में पदस्थ अपने पिता जी के साथ फर्स्ट ब्राम्हण बटॉलियन की बैरक में रहते थे। 
जबलपुर की ब्रिटिश रेजीमेंट चेशायरने राष्ट्रीय हॉकी जगत में उस समय जबलपुर का नाम गौरवान्वि‍त किया, जब इस टीम ने बंबई में लगातार सन् 1910, 1911 व 1912 में आगा खां हाकी टूर्नामेंट जीता। उन्हीं की तरह जबलपुर के देशी क्लबों ने भी लखनऊ के प्रसिद्ध रामलाल हॉकी कप को सन् 1915 व 17 में जीता। तब तक जबलपुर के देशी हॉकी क्लब भोपाल के प्रसि‍द्ध ओबेदुल्ला एवं इंतीदार हॉकी टूर्नामेंट में अपना डंका बजा चुके थे। जबलपुर के सदर निवासी इब्राहिम व राबर्टसन कॉलेज के नुरूल लतीफ में हॉकी का ऐसा कौशल था कि वे सन् 1920 में ऑल इंडिया की किसी भी टीम में खेल सकते थे। एंग्लो इंडियन ख‍िलाड़‍ियों से सजी जीआईपी रेलवे भी इसी समय उभर कर सामने आई और इस टीम ने सन् 1921, 1922, 1925 एवं 1926 में आगा खां टूर्नामेंट के साथ सन् 1923 में ग्वालियर गोल्ड कप टूर्नामेंट  को पहली बार भाग लेते हुए जीता। उस समय जबलपुर के क्लब डीआईजी पुलिस, सिटी व केंटोंमेंट स्पोर्ट्स भारत के नामी व प्रथम श्रेणी के क्लबों में शामिल किए जाते थे। इस समय को जबलपुर की हॉकी का स्वर्ण‍िम युग कहा जा सकता है।
जेईएए ने सन् 1907 में स्कूलों में हॉकी की शुरूआत करवाई। स्कूलों में अंजुमन, सीएमएस, मॉडल, क्राइस्ट चर्च, सेंट अलॉश‍ियस, एपी नर्बदा हॉकी नर्सरी में रूप में पहचानी गई।
सन् 1928 हॉकी के लिए श‍िखर वर्ष के लिए जाना गया, जब रेक्स नॉरिस और मोरिस रॉक ने भारतीय हॉकी टीम का ओलंपिक में प्रतिनिधि‍त्व किया। इस भारतीय टीम में एम्सटर्डम में पहली बार हॉकी में ओलंपिक का स्वर्ण पदक जीता। इसके पश्चात् जबलपुर के कई हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने व‍िभ‍िन्न ओलंप‍िक खेलों में भागीदारी की। इनमें सुलवान सन् 1932, कॉनराय 1948 इंग्लैंड ओलंपिक, पीस ब्रदर्स 1960 ओलंपिक और आस्ट्रेलियन हॉकी कोच मर्व एड्म्स भी जबलपुरियन रहे हैं।
जबलपुर के नेमीचंद्र अग्रवाल, एस. एन. शुक्ला, एस. के. नायडू व बी. के. सेठ ने अंतरराष्ट्रीय अम्पायर्स के रूप में ख्याति अर्जित की। जबलपुर के चारों अम्पायर्स ने बैंकाक, तेहरान व 1980 के एशि‍यन गेम्स में अम्पायरिंग की।
जबलपुर में महिला हॉकी को उस समय गति व लो‍कप्रियता मिली, जब सन् 1936 में नागपुर में सीपी एन्ड बरार लेडि‍स हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। शुरूआत में महिला हॉकी में एंग्लो इंडियन व पारसी समाज की महिलाओं ने हॉकी में रूचि दिखाई और इन्हें इंटरनेशनल नॉरिस व रॉक ने प्रश‍िक्ष‍ित किया। सन् 1945 में जबलपुर का पहला महिला हॉकी क्लब जुबली क्लब बनाया गया और इसने जल्द प्रस‍िद्ध‍ि बिखेरना शुरू कर दी। जबलपुर की स्मि‍थ सिस्टर्स व नॉरिस सिस्टर्स ने नागपुर के क्लब से  खेलते हुए उस समय मध्यप्रदेश को नेश्नल चार बार विजेता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दो बहिनों की जोड़ी  को भारत की पहली महिला टीम में शामिल किया गया, जिसने 1953 में इंग्लैड का दौरा किया था। इसी टीम ने सन् 1956 में आस्ट्रेलिया का दौरा भी किया। सन् 1961 में जबलपुर विश्वविद्यालय में महिला हॉकी ख‍िलाड़‍ियों की संख्या को देख कर महाकौशल महिला हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। महाकौशल हॉकी एसोसिएशन की टीम ने सन् 1962 में अंतरविश्वविद्यालय टूर्नामेंट में पंजाब के साथ फाइनल मैच खेला।
जबलपुर की महिला हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस‍िद्ध‍ि पाई, उनमें चारू पंड‍ित, सरोज गुजराल, सिथ‍िंया फर्नांडीज, अविनाश सिद्धू (भारत की कप्तान रहीं), गीता राय, कमलेश नागरथ, आशा परांजपे, मंजीत सिद्धू और मधु यादव प्रमुख हैं। अविनाश सिद्धू ने भारतीय हॉकी टीम के कोच, मैनेजर, रैफरी की भूमिका भी निभाई। संभवत: वे भारत की एकमात्र महिला ख‍िलाड़ी रहीं हैं, जिन्होंने दो खेल हॉकी व वालीबाल में भारतीय टीम का प्रतिनिध‍ित्व किया। अविनाश सिद्धू बांग्लादेश शूट‍िंग टीम की खेल मनोवैज्ञानिक भी रहीं और उनके प्रयास से बांग्लादेश ने सैफ खेलों में मेडल जीतने में सफलता पाई।

                                                                                                 
                        


    

डा. संदीप जैन कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित

लाइन्स आफ विजडम
राजीव सभरवाल डा. जैन को पुरस्कृत करते हुए
बलपुर के सुप्रसिद्ध र्इएनटी चिकित्सक  डा. संदीप जैन को आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक http://www.cameraderie.co.in द्धारा आयोजित कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन-2013 में अम्योचर (शौकिया) श्रेणी में उनकी फोटो प्रविष्टि लाइन्स आफ विजडम के लिए जूरी च्वाइस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। पिछले दिनों मुंबर्इ में आयोजित एक भव्य समारोह में आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक की प्रबंध संचालक व सीर्इओ चंदा कोचर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर राजीव सभरवाल और के. रामकुमार ने डा. संदीप जैन को सिल्वर अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित किया। डा. संदीप जैन वेस्टर्न जोन में विजेता रहे और पुरस्कृत होने वाले छायाकारों में वे मध्यप्रदेश से एकमात्र छायाकार थे। डा. जैन की प्रविष्टि को जूरी ने 16 सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि में भी चयनित किया।

अवार्ड
कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में देश भर से 8700 छायाकारों ने भाग लिया था और इसमें कुल 11,000 से ज्यादा फोटो प्रविष्टियां प्राप्त हुर्इ थीं। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छायाकारों को अपनी प्रविष्टि आन-लाइन प्रेषित करनी थी। प्रतियोगिता के निर्णायक ओग्लिवी एंड मेथर (ओएंडएम) एडवरटाइजिंग एजेंसी साउथ एशिया के एक्जीक्यूटिव चेयरमेन व क्रिएटिव डायरेक्टर पीयूष पांडे, स्मार्ट फोटोग्राफी के टेक्नीकल एडीटर रोहिंटन मेहता, लोनली प्लेनट के संपादक वर्द्धन कोंडविकार, प्रसिद्ध फैशन फोटोग्राफर रफीक सैयद, प्रसिद्ध इंडस्ट्रियल फोटोग्राफर हरि महीधर और आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के. रामकुमार थे। प्रतियोगिता में निर्णायकों के निर्णय के अतिरिक्त आन-लाइन वोटिंग से प्रतियोगिता का समग्र परिणाम निकाला गया।



    

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