मनोहर नायक घर में राजनीतिक माहौल और बहसें थीं। पिता सर्वोदय में थे , पर राजनीति में भी जैसे शामिल ...
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यादों में जयप्रकाश

  •  मनोहर नायक 




घर में राजनीतिक माहौल और बहसें थीं। पिता सर्वोदय में थे , पर राजनीति में भी जैसे शामिल थे, अन्य सर्वोदयी लोगों की तरह उससे विरत नहीं थे। यही कारण था कि कम उम्र से ही देश-प्रदेश के नेताओं की बातें और बहसें सुनने का अभ्यास हो गया और उस ओर दिलचस्पी बढ़ी।
बहरहाल, राजनीतिक रूप से जब होश संभाला तब बांग्लादेश बनवाकर इंदिरा गांधी 'दुर्गा’ कही जा रही थीं। ग़रीबी हटाओ नारा लगाकर उन्हें शायद उम्मीद रही हो कि 'लक्ष्मी’ भी कही जाने लगेंगी पर भ्रष्टाचार और लूटतंत्र ने उनके ' देवीत्व ' का हरण कर लिया | जेपी आंदोलन की  तैयारी वाली गहमागहमी शुरू हो गयी थी। माहौल हर दिन हंगामी होता जा रहा था। मुझे पिताजी के सर्वोदय से बाहर न आने पर कोफ़्त थी। जेपी ने अपनी राजनीतिक ख़ामोशी तोड़ दी थी। तभी एक दिन पिता दिल्ली रवाना हो गए, वहां प्रदर्शन-जुलूस निकलना था। वे कई आंदोलनकारियों के साथ एक हफ़्ता-दस दिन तिहाड़ में बंद रहे। यह 1973 के उत्तरार्द्ध का समय है। लौटकर आये तब प्रदेश के राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं की जबलपुर में गोकुलदास की धर्मशाला की पहली मंज़िल के छत पर बैठक हुई , मुंबई  के सर्वोदयी नेता गोविंदराव देशपांडे की देखरेख में, उसमें पिता मध्यप्रदेश संघर्ष समिति के संयोजक चुने गए। हमारा घर ही एक तरह से संघर्ष समिति का दफ़्तर हो गया था और भोपाल में शायद विधायक विश्रामगृह में किसी विधायक का एक कमरा। वैसे आधा दफ़्तर पिताजी के झोले में ही रहता था। इससे मुझे याद आया कि हमारे पिता के समाजवादी मित्र भोला (पाठक) चाचा बताते थे कि जब जबलपुर में समाजवादी पार्टी का सम्मेलन हुआ तो वे महासचिव अशोक मेहता को लेने स्टेशन गए। अशोकजी के साथ कोच से उनका पूरा दफ़्तर ही निकला, टाइपराइटर, साइक्लोस्टाइल मशीन, स्टेशनरी का सामान आदि। ... संघर्ष समिति बन जाने के बाद घर में मिलने वालों का तांता लगा रहता। नियमित  आने और देर तक बैठने वालों में शरद यादव थे। तब डाक दो बार बँटती थी, मेरा काम डाक सामग्री लाना, पोस्ट करना, तार करने जाना, वक्तव्य अख़बारों में पहुँचाना, रिजर्वेशन कराना, ट्रेन में साइड लोअर और बस में खिड़की वाली सीट लेने की हमेशा कोशिश होती, क्योंकि पिताजी को वे ही पसंद थीं |अगर वे एक-दो दिन के लिए ही कहीँ गए , तो साइकिल पर उन्हें स्टेशन या मोटर स्टैंड छोड़ने जाता । बीसों पत्र रोज़ आते। अख़बार पढ़कर पिता सुबह से जवाब देने का काम करते।  डेस्क में एक कोने में वे पत्र रखे जाते जिन पर रिपलाइड लिखा रहता था।
पिताजी
का जेपी से परिचय उस समय से था , जब वे सीपी एंड बरार स्टुडेंट कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उसके एक समारोह में जेपी आये थे। 1941 से यह नियमित बना। जब जेपी राजनीति से अलग थे, तब भी जबलपुर से गुज़रते वक़्त वे पिता समेत कुछ अन्य पूर्व समाजवादियों को इत्तला कर देते थे, ये सब स्टेशन जाकर उनसे मिलते थे। बुंदेलखंड के आत्मसमर्पित बागियों के बचाव कार्य में पिता जेपी के कहने से लगे, और पहली बार उन्होंने अपना वकालतनामा शायद 1972  में बनवाया। जेपी सर्वोदय में रहते हुए भी राष्ट्रीय मसलों से कभी दूर नहीं रहे। वे अपनी राय , अपना सहयोग हमेशा  देते रहे। उसी तरह पिता भी मुख्यत: राजनीतिक प्राणी थे, और हर मामले में बयान ज़रूर देते थे , सभा - गोष्ठियों में जाते और बिना लाग लपेट के दो टूक अपनी राय रखते , कोई बड़ा मुद्दा हो तो परचा निकल आता | एक तरह से उनके वक्तव्य अख़बारों के दफ़्तर पहुँचाते-पहुँचाते मै ख़ुद अख़बारनवीस बन गया। इसलिए जब पिता जेपी आंदोलन में कूदे तो सर्वोदय के दूसरे आंदोलन-विरोधी लोगों ने आक्षेप किया कि देखिये मौक़ा लगते ही नायकजी राजनीति में कूद पड़े। यहाँ मधु लिमये की बात याद आती है , जो एक लेख में उन्होंने अच्युत पटवर्धन के संबंध में कही थी। लिमयेजी सभी समाजवादी नेताओं के क़रीब रहे। लोहियाजी, जेपी, एसएम जोशी, नानासाहेब गोरे और अच्युत पटवर्धन व उनके बड़े भाई रावसाहेब पटवर्धन, सभी के वे निकट थे। लिमयेजी ने 1942 में भूमगित आंदोलन चलाने, जनता को नेतृत्व देने तथा समाजवादी आंदोलन में योगदान के लिए अच्युतजी की प्रशंसा करते हुए उनके राजनीति से अलग हो जाने के बारे में लिखा, 'सार्वजनिक जीवन से निवृत्त होने के अच्युतजी के निर्णय या उनके अंतिम 42 सालों में नीले पंछी की विफल खोज याने उनकी जीवन-साधना या कार्य के बारे में मेरी कुछ भी राय हो, इतना स्पष्ट है कि मेरी उन कामों में रुचि नहीं थी।’ उनका कहना था 195० के बाद अच्युतजी जमकर नहीं बैठे... ' दौड़-धूप में, सार्वजनिक जीवन में तथा जन-संघर्ष के अग्निकुंड में लोहिया के समान अपनी विचारधारा उन्होंने विकसित नहीं की। बंबई में अशोक मेहता की तरह मज़दूरों और जनता के बीच तेजस्विता से काम नहीं किया। मार्क्सवाद से सर्वोदय तक जेपी ने लम्बी यात्रा की, लेकिन जनता, जनता की समस्याओं और उसके सुख-दुख से उन्होंने कभी रुख़सत नहीं ली, इसलिए 1973-77 के समय तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व कर सके। अच्युतजी ने ऐसा कुछ नहीं किया। इन सब बातों से वे अलिप्त रहे। ' ... मधु जी का यह बयान जन-प्रेरित, सरोकार- युक्त लोगों की मन:स्थिति और मूल प्रेरणाओं का सही बखान करता है। ऐसे लोगों की जन - सेवा, जन - संघर्ष की लौ कभी मंद नहीं पड़ती।
जयप्रकाश और राम मनोहर लोहिया दोनों ही विलक्षण समाजवादी नेता रहे हैं। दोनों का प्रभाव चुम्बकीय था। डा. लोहिया साकार संघर्ष थे। उनका असर आमजन से लेकर पढ़े-लिखों और बुद्धिजीवियों में व्यापक था। जेपी कई मामलों में नेताओं के भी नेता थे। समाजवादी पार्टी के पहली पीढ़ी के नेता भी उनके ज़्यादा करीब और आत्मीय थे। ख़ुद डा. लोहिया ने कहा था कि इस देश को हिलाने की क्षमता जेपी में है , जिस दिन आज़ाद हिंदोस्तान में  वे   पुलिस की लाठी खा लेंगे , उस दिन   उन्हें समझ में आ जायेगा। जून 74 में पटना में ठीक यही हुआ था। लिमये ने भी लिखा है कि, जयप्रकाश नारायणजी का व्यक्तित्व नि:संदेह अत्यंत विलोभनीय था। उनके पास  जो ऋजुता  थी , उसका नाना साहेब गोरे द्बारा किया गया गुणगान बड़ा सार्थक है, ' उसी के कारण  कार्यकर्ता  जयप्रकाशजी की तरफ़ खिंचे चले आते थे। उनके प्रति समाजवादी कार्यकर्ताओं का प्यार और आकर्षण कभी कम नहीं हुआ। ... लोहिया का व्यक्तित्व प्रखर था, उसमें बौद्धिक आंच थी, जेपी शायद अधिक आत्मीय और स्निग्ध थे।
जेपी के इस आकर्षण के कई उदाहरण दिमाग़ में आ रहे हैं, जिसे  यहाँ-वहाँ पढ़कर  जाना । एमजे अकबर जब 'संडे’ के सम्पादक थे , तब शायद आनंद बाज़ार समूह ने एक पत्रिका 'न्यू डेल्ही’ निकाली थी। एमजे ने अपने गुरु खुशवंत सिंह को उसका संपादक बनाया। उसके मात्र छह ही अंक निकले।  एक अंक में खुशवंत सिंह ने एक लम्बा  दिलचस्प लेख जेपी पर लिखा था। एक सुबह घर में बैठे - बैठे सरदार लेखक को तब की राजनीति और नेताओं से एकाएक गहरी वितृष्णा हुई। अख़बार में एक ख़बर जेपी की  थी, जो बिहार  में  किसी मुहिम में लगे थे। उन्हें लगा कि एक यही सही आदमी राजनीति में है और वे सूटकेस लेकर जेपी के पास पहुँच गए और बोले कि जेपी मैं यहाँ आपके सेक्रेटरी के रूप में काम करूँगा | जेपी ने कहा कि आप यहाँ रहिये और जो काम हो रहा  है  उसके बारे में लिखिये। खुशवंत सिंह ने लिखा कि जेपी ने उदारतापूर्वक उन्हें अपने शाम के दो पैग लेने की इजाज़त दे दी। लेख काफ़ी विस्तार में था, अब याद नहीं, पर यह उसमें ज़रूर था कि जब जेपी आंदोलन चल रहा था उस समय खुशवंत सिंह बम्बई में वीकली के सम्पादक थे। जेपी बंबई आये तो काफ़ी कोशिशों के बाद भी बातचीत का मौक़ा नहीं मिला। वहाँ से जेपी पुणे गये, तो खुशवंत सिंह ने डेकन क्वीन में अपना टिकट करवा लिया और दो घंटे  जेपी से बातचीत करते पुणे पहुँचे। उन्होंने लिखा कि जेपी ने उन्हें अमेरिका में अपनी महिला मित्रों के बारे में भी बताया। पर लेख यहीं पर यह कहते हुए ख़त्म हो गया कि इस सब पर आगे लिखूंगा। उन्होंने शायद लिखा भी हो पर वह अपन को कभी पढ़ने को नहीं मिला।
'मेरे जीवन की कुछ यादें’ पुस्तक में कम्युनिस्ट नेता ज़ेड ए अहमद ने लिखा कि कांग्रेस पार्टी के ऐतिहासिक फ़ैज़पुर अधिवेशन में आचार्य नरेंद्र देव, डा. लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, यूसुफ मेहर अली, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि समाजावादी नेताओं से सम्पर्क हुआ, जो आगे गहरी मित्रता में फलीभूत हुआ। अहमद लिखते हैं कि ' मुझे सबसे अधिक जयप्रकाश नारायण ने प्रभावित किया, उनकी मेरे दिमाग़ पर गहरी छाप पड़ी। मुझे उनके विचार और उनको अमल में लाने का तरीक़ा बहुत पसंद था | उनके व्यक्तित्व की वजह से उनका बेहद सम्मान था। उनके अंतिम दिनों तक मेरा उनसे आत्मिक लगाव बना रहा।’ जेपी के बीमारी के समय जब अहमद साहब उन्हें देखने पटना गए तो एक दिन जेपी ने उनसे कहा कि अहमद, मैं जब भी इलाहाबाद जाता था तो जवाहरलाल के यहाँ ठहरने के बजाय तुम्हारे यहाँ ही रुकता था और हाजरा बेग़म मेरी सेवा करती थीं, जानते हो क्यों?... जेपी ने कहा जवाहरलाल की तो मैं इज़्ज़त करता ही था, पर तुम्हें राजनीतिक कार्यकर्ता से ज़्यादा अपना गहरा मित्र मानता था। जब अहमद ने इस पर कहा कि यह तो मैं भी मानता हूँ, तब जेपी ने कहा तुम झूठ बोल रहे हो। तुमने कभी मेरे ऊपर विश्वास नहीं किया।... अहमद साहब अवाक् थे, संयत होते हुए उन्होंने कहा कि आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, तो जेपी ने कहा फिर तुमने मुझसे  समाजवादी पार्टी में रहते हुए यह क्यों छिपाये रखा कि तुम कम्युनिस्ट पार्टी के भी सदस्य हो? ज़ेडए अहमद ने विस्तार से उस समय की राजनीतिक स्थिति बताते हुए जेपी से कहा इन हालात में मैं यह बताकर कि मैं कम्युनिस्ट पार्टी का कार्डधारी सदस्य हूँ, आपके सान्निध्य से वंचित होना नहीं चाहता था।
मीनू मसानी की पुस्तक 'ऑल वाज़ बिलिस इन दैट डॉन’ में कई क़िस्से हैं। मीनू मसानी अंग्रेज़ी काट के व्यक्ति थे आचार-व्यवहार सब में। एक बार गांधी जी से मिलने गये मसानीजी ने उनसे हाथ मिलाया था और जेपी ने उनके पैर छुए  तो मसानी ने एतराज  जताया | इस पर उनसे जेपी ने कहा कि मैं कुछ कर नहीं सकता, मुझे ये संस्कार मिले हैं। यह बात सच है कि समाजवादी पार्टी की पहली पीढ़ी के नेताओं में सुभाष बाबू की तुलना में जवाहरलाल नेहरू के प्रति ज़्यादा आकर्षण था। मीनू मसानी ने कांग्रेस के किसी अधिवेशन का वर्णन करते हुए बताया कि वे जेपी के साथ शामियाने के बाहर खड़े होकर राजेंद्र बाबू का भाषण सुन रहे थे। राजेंद्र बाबू नेहरू के ख़िलाफ बिना नाम लिये हुए बोल रहे थे कि कुछ लोग बाहर से विचारों का आयात करके यहाँ थोप रहे हैं। मसानी ने लिखा कि जेपी यह सुनकर उत्तेजित हो गए और बोले ये राजेंद्र बाबू नेहरू के जूते के बराबर भी नहीं है। बाद में जेपी अनमने हो गए तो मसानी ने कारण पूछा। जेपी ने कहा कि राजेंद्र बाबू बुज़ुर्ग  नेता हैं, मुझे उनके बारे में यह नहीं कहना चाहिए था, मैं उनसे माफ़ी मागूँगा। मसानी ने कहा उन्हें तो यह पता भी नहीं, फिर अगर तुम्हें पछतावा हो रहा है, तो यह काफ़ी है, पर जेपी ने राजेंद्र बाबू को बताया कि उन्होंने ऐसा कहा था और उनसे माफ़ी माँगी।
जयप्रकाश अभिनंदन ग्रंथ में हज़ारी प्रसाद द्बिवेदीजी का उन पर एक लेख है। शांतिनिकेतन में जेपी का भाषण अंग्रेज़ी में हुआ। द्बिवेदीजी से उन्होंने हिदी में बात की। दो - एक लोग थे जिनसे जेपी भोजपुरी में बतिया रहे थे। पंडितजी से आख़िर नहीं रहा गया और उन्होंने भोजपुरी में जेपी से कहा कि आप हिंदी में बात कर मुझे काहे का दंड दे रहे हैं। तब से फिर कभी जब भी मिलना हुआ जेपी ने उनसे भोजपुरी में ही बात की।
'इलेस्ट्रेटेड वीकली’ में अस्सी के दशक में भोला चटर्जी के समाजवादियों, गांधी-नेहरू-सुभाष पर काफ़ी लेख छपते थे। एक लेख में उन्होंने लिखा था कि दरबार हाल या कहीं किसी समारोह में जेपी भी थे। कुछ देर बाद नेहरू उनके पास आये और बाँह पकड़कर उन्हें एकांत में ले गए और बातें करते हुए बोले, जेपी डुयू नो, यू शेयर ऑल माई सक्सेस और फ़ेल्यूर्स (जेपी क्या तुम जानते हो, तुम मेरी हर सफलता और असफलता के भागीदार हो)। 'लोक देवता जवाहर’ में दिनकरजी ने लिखा है कि जेपी से एक बार नेहरू ने कहा कि इस देश का प्रधानमंत्री जैसा होना चाहिए वे बातें तुममें हैं, पर तुम यह न समझो कि तुम आओगे और सब ठीक कर दोगे |  तुम्हें सब चीज़ें समझनी होंगी। हम लोग ऐसे ही आये और फिर  ग़लती करते चले गये। ... कुलदीप नैयर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के प्रेस सचिव थे। अपनी पुस्तक 'बिटवीन द लाइन्स’ में उन्होंने लिखा कि एक बार उन्होंने शास्त्रीजी से यह पूछने का साहस किया कि अगर आपके मुक़ाबले इंदिरा गाँधी प्रत्याशी होतीं तो नेहरू के अनन्य भक्त होने के नाते आप तो मैदान से हट जाते? शास्त्रीजी ने उन्हें हैरत में डालते हुए कहा कि तुम मुझे ऐसा संत मत समझो... फिर कुछ देर चुप रहकर वे बोले देश की आज जो स्थिति है उसमें जयप्रकाशजी सबसे उपयुक्त प्रधानमंत्री  होते।
जेपी सवालों से परे नहीं  हैं , बल्कि आज  ज़्यादा उनके घेरे में हैं | सवाल ये पुराने हैं, आज  देश जिस संकटपूर्ण स्थिति में फंसा हुआ है, संघ का फ़ासीवाद तेज़तर - तीव्रतर बढ़ रहा है... लोकतंत्र और संवैधानिकता का समूल उच्छेदन वही ताक़त करने में लगी है , जो ग़ैरकांग्रेसवाद और सम्पूर्ण क्रांति की पीठ पर चढ़कर यहाँ तक पहुँची हैं | डॉक्टर साहब ने इन्हें प्रादेशिक सत्ताओं का और लोकनायक ने केंद्रीय सत्ता का स्वाद चखाया | दादा धर्माधिकारी ने अपनी पुस्तक  ' दादा के शब्दों में दादा ' में एक जगह लिखा है कि ' जेपी की ऋजुता का कोई अंत नहीं "...  क्या अपने इसी गुण के कारण वे उन  शातिर नेताओं, मित्रों, एक घराने और राजनीति  के मोहरा बन  गये, जो घात लगाये बैठे थे  ? क्या कोई अन्य ' निरपेक्ष ' रास्ता नहीं था उनके पास , जिसके बारे में वे निरंतर सोचते- पढ़ते- लिखते रहे? संघ को अपराध और विष  मुक्त करने वाले  उनके दुर्भाग्यपूर्ण बयान! एक तरह से गांधीजी  को ही कटघरे में ला खड़ा करने वाला नेहरू बनाम पटेल वाला बयान ! यह सही है कि सम्पूर्ण जेपी - लोहिया इन विवादों से कहीं बढ़े हैं | जेपी ने लिखा  ' जीवन विफलताओं  से भरा '... यह लिखते हुए क्या ये विफलतामूलक विसंगतियां जेपी के मन में थीं ? दरअस्ल  उस समय एक ज़रूरी मसला, लोकतांत्रिकता  की ख़ातिर कांग्रेस के निरंकुश होते जा रहे राजनीतिक एकाधिकार को तोड़ना और सार्थक विकल्प तलाशना था | तब आज के ख़तरे का  दूर -दूर तक अंदेशा नहीं था | कांग्रेस के ख़िलाफ़ लोहियाजी जुनून में थे, नेहरू के विरुद्ध कड़वाहट जितनी बढ़ती समाजवादी सम्प्रदाय उतना ही ताली पीटता, ऐसे ही जेपी जब कहते कि संघ अगर देशद्रोही है तो समझो जेपी भी देशद्रोही... लोग ख़ुश होते और संघ-जनसंघ के दिलों में लड्डू फूटते... और आज हाल यह है कि  नेहरू- कांग्रेस  खंडित - भग्न हैं, विपक्ष विपर्यस्त है  , संघ, भाजपा और उनके भक्तों - समर्थकों को छोड़ शेष सभी  देशद्रोही हैं  !  ये सवाल घुमड़ते रहते हैं... ये उन सभी से हैं जो विकल्प और लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रहे थे, मेरे पिता भी उनमें शामिल हैं, उनकी तरफ़ से यह संतोष तो है ही कि वे संघ - जनसंघ के परम शत्रु थे और मध्य प्रदेश जैसे  जनसंघ -बली  राज्य की संघर्ष समिति में उन्होंने उसे दबाकर रखा | तमाम दबावों के बावजूद शरद यादव को जनता प्रत्याशी बनाया | समिति के यमुना प्रसाद शास्त्री और  लाड़लीमोहन निगम जैसे सदस्यों को वे झकझोरने वाले पत्र लिखकर उनसे बैठकों में अधिकाधिक सक्रिय होने को कहते और  चेतावनी देते  कि जनसंघ बड़ी मछली है  वह तुम्हें खा जायेगी | संघ - -जनसंघ का सोच - विचार देखिये,  आपात्काल से रिहाई के दो दिन में ही प्रदेश जनसंघ का, महासचिव प्यारेलाल खंडेलवाल द्वारा  हस्ताक्षरित पत्र  पिताजी को मिला , जिसमें बदली  हुई स्थितियों में संघर्ष समिति के औचित्य पर सवाल करते हुए उसकी व्यर्थता की ओर इशारा था ... यानि साफ़ था कि   जनसंघ  मेलमिलाप छोड़ अपने हिस्से के लिये दांत और नाख़ून पैने करने में लग गया था | इलाहाबाद के  'अमृत प्रभात ' अख़बार के रविवारी परिशिष्ट में, जिसके सम्पादक मंगलेश डबरालजी थे, पिताजी ने जनता पार्टी पर लेख लिखा था | उन्होंने लिखा कि यह भाव रूप पार्टी है , जब तक चले, चल जाये... सभी को केंद्र की सत्ता का स्वाद मिल गया है, पर जनसंघ को उससे भी बहुत ज़्यादा कुछ  मिला है।
पर 73-74-75 के वे दिन जेपी को समर्पित थे। हमारा घर भी एक केंद्र था। 'एव्रीमेन्स', ' प्रजानीति' और 'प्रतिपक्ष’ से जेपी और आंदोलन की नियमित खुराक मिलती थी, डाक से और पत्रिकाएं आतीं। जयप्रकाशजी पर दिनकर की कविता कंठस्थ हो गयी थी। जेपी को एक बार जबलपुर आने पर स्टेशन पर देखा था, वे दादा धर्माधिकारी के नामी वकील पुत्र वाईएस धर्माधिकारी, जो पारिवारिक और क़रीबी लोगों के लिये  बब्बन थे, के यहाँ ठहरे थे। वे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के एडवोकेट जनरल भी हुए और जेपी आंदोलन में वह पद उन्होंने  छोड़ भी दिया था | उस शाम स्टेशन पर जेपी ने व्हीलर के यहाँ से एक किताब ली, पैसा फ़ौरन वकील साहब ने दिया। फिर जेपी आंदोलन के तूफ़ानी दिनों में इमरजेंसी लगने के एक हफ़्ते पहले वे जबलपुर आये थे, संघर्ष समितियों के सम्मेलन में |  तीन दिन पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला इंदिराजी के ख़िलाफ़ आ गया था। सम्मेलन के आयोजन पर सरकार का भारी विरोध और अड़चनें झेलते हुए अंतत:  सम्मेलन जबलपुर के मानस-भवन में हुआ।  इसके बाद जेपी दिल्ली गए, बोट क्लब पर उनका विवादास्पद भाषण हुआ और फिर आपातकाल आ गया।
आपातकाल के उन दिनों में नये खुले जानकीरमण कॉलेज में मैं बीए का छात्र था। तब छात्र-छात्राएं भी ज़्यादा नहीं थे। शिक्षक भी गिने-चुने। प्राचार्य हमारे मोहल्ले के ही पत्रकार-लेखक हरिकृष्ण त्रिपाठी थे , जो युवावस्था में हमारे पिता के समूह में समाजवादी कार्यकर्ता थे। उनसे बात करके बिना किसी प्रचार के 1976 की ग्यारह अक्टूबर को कॉलेज में जयप्रकाश जी का जन्मदिन मनाया । मैं दादा धर्माधिकारी को, जो उन दिनों जबलपुर में थे, निमंत्रित का आया था। दादा रिक्शे पर आये, ख़ुद पैसे दिये और उसी प्रकार एक घंटे भाषण देकर चले गए। सिर्फ़ एक माला पहनाकर उनका स्वागत किया। दादा ने कहा कि इस समय देश में दो ही विभूतियाँ हैं, जेपी और इंदिरा गाँधी। उन्होंने विस्तार से ऐसा कहने के कारण बताते हुए कहा कि एक विभूति भटक गयी, भटका रही है तो दूसरी उसे राह पर लाने की कोशिश कर रही है। एक को सत्ता का, तंत्र का अंहकार है, दूसरी लोक का अभिमान है।
 लेकिन जेपी को पहली बार  आठ मार्च 1962 में देखा था, जब वे घर आये थे। हमारे छोटे भाई का नाम उन पर ही है, जयप्रकाश।  जय आठ साल के थे। उन्हें  टायफ़ाइड था, तेज़ बुखार। जेपी शहर में थे, उनके साथ पिता थे। जयप्रकाश  जेपी को देखने की रट लगाये हुए थे । पिता ज़ाहिर है परेशान थे। जेपी ने भांप लिया और पूछा कि आप चिंतित क्यों हैं ? पिता ने बताया तो बोले , आपको पहले बताना था। अभी चलते हैं। उन्हें  रात आठ बजे सवाईमलजी जैन के यहाँ भोजन करने जाना था, उसके बाद आने का तय हुआ। छह बजे अपनी गली के नुक्कड़ पर मैं खड़ा था तभी हमारी सामने की गली के रज्जू कक्का यानी राजेंद्र तिवारी, जो बाद में एडवोकेट जनरल हुए, साइकिल पर तेज़ी से आये और दूर से ही मुझे आवाज़ दी और कहा कि जेपी आने वाले हैं, घर में बता दो।  नौ बजे के करीब जेपी आये। पिता ने एक सूत की माला जय को दी पहनाने के लिए और एक ख़ुद पहनायी। जेपी ने माला उतारकर जयप्रकाश का पहना दी और पास बैठकर बहुत प्रेम से बातें करते रहे और बोले जल्दी ठीक हो जाओगे। थोड़ा कुछ मीठे का टुकड़ा खाया। हमारी आजी को नमन किया, माँ से दो बातें की। बाहर लोग जमा हो गये थे। वे सबको नमस्कार करते हुए लौट गए।
इमरजेंसी में पिता जेल चले गए। मैं पत्रकारिता विभाग में डिप्लोमा करने लगा। हमारे विभागाध्यक्ष कालिका प्रसाद दीक्षित, 'कुसुमाकर’ थे। 1976 में नंवबर के तीसरे सप्ताह में विभाग के छात्र कुसुमाकरजी के साथ कलकत्ता गए जहाँ हिदी के पहले अख़बार' उदंत मार्तंड ' की  डेढ़ सौवीं जयंती का समारोह था | ' उदंत मार्तंड '  को छात्र मज़ाक में डंडे की मार से उखड़ा दाँत कहते थे | तीन-चार दिन कलकत्ता रहे। लौटे तो पटना आ रहा जानकर अचानक मन पटना उतरकर जेपी से मिलने का हो आया। संयुक्त टिकट थी। मैंने एक अध्यापक से कहा कि टिकट गेट पर दिखाकर मुझे बाहर निकाल दें , लौट में अपने खर्चे पर आऊँगा। बाहर आकर पहला काम यह किया कि एक झोला साथ रखा, बाक़ी सामान अमानती सामान गृह में जमा करा दिया और रिक्शा करके क़दम कुआं पहुँच गए। बाहर काफ़ी पुलिस थी। अंदर काफ़ी लोग ऊपर दालान में बैठे थे। वहीं पहली बार प्रभाष जोशी जी को देखा। उनसे बात हुई। बहन मंजु का विवाह अनुपम मिश्र से तय हो चुका था, प्रभाषजी मिश्र परिवार के घनिष्ठ थे, इसलिए वे पहचान गए। थोड़ी देर में जेपी बाहर आए। एक कोने से सबसे मिलते हुए मेरे पास आये तो प्रभाषजी ने कहा ये नायकजी के पुत्र हैं, जेपी ने अच्छा कहा और आगे जाने लगे। शायद जेपी ने दादाभाई नाइक, जो उस समय जेल से बाहर थे, उनका पुत्र समझा। प्रभाषजी को भी कुछ खटका हुआ तब उन्होंने फिर बताया ये जबलपुर के गणेशप्रसाद नायक के पुत्र हैं तब जेपी रुक गये और नाम पूछकर बोले, मनोहर तुम नीचे जाकर प्रभावती कक्ष देखो, फिर ऊपर आओ तब बात करते हैं।
थोड़ी देर बाद फिर ऊपर गया, दालान खाली हो गयी थी, एक सिरे पर जो कमरा था, वहाँ  प्रभाषजी ट्रांजिस्टर सामने रख कामेंट्री सुन रहे थे। जेपी एक बड़ी टेबिल के पास कुर्सी पर बैठे थे। बाबू  गंगाशरणजी और एक अन्य उनसे बातें कर रहे थे। फिर वे भी चले गए। जेपी खाना खाने वाले थे तभी मेरे पर उनकी नज़र पड़ी तो बोले आओ-आओ। उनके साथ खाना खाया। उन्होंने लड्डू दिया, मैंने एक खाया तो बोले अरे नवयुवक हो और ब्राह्मण हो एक और खाओ, मैंने एक और खाया। इस बीच आने का प्रयोजन पूछा, जब मैंने कलकत्ता जाने का कारण और लौटते में मिलने के लिए आना बताया तो जैसे उन्हें राहत मिली। वे बोले, अच्छा किया, आ गये, अब यहाँ रुको। तब मैंने कहा कि और छात्र पहुँचेंगे और मैं नहीं तो माँ चिंतित होंगी, इसलिए रात को निकल जाऊंगा। खाना खाकर जेपी ने मुझे एक तरह से घर दिखाया। डायलिसिस मशीन दिखायी और बोले परसों होगी, बड़ा तकलीफ़देह है। फिर अपने कमरे में ले गए और बोले यह बिस्तर है, तुम इस पर आराम कर लो। एक कोने में  छोटी  टेबिल पर अशोक मेहता की एक मोटी किताब थी, जेपी ने बताया कि अशोक ने भेजी है, मुझे राय देनी है। वे फिर बोले अब तुम आराम कर लो, मैं तो बाहर बैठूँगा। मैंने कहा कि मेरी आदत दोपहर में लेटने की नहीं है, मैं आपके साथ ही बैठूँगा।
उस वक़्त ढाई-तीन बज रहे थे। दो घंटे जेपी से अकेले बैठे बातें होती रहीं। घर में सब परिवार वालों के बारे में पूछा। अपनी दिनचर्या बतायी, फिर बोले, कलकत्ता में क्या हुआ बताओ। मैंने कहा कि वहाँ मुख्य अतिथि उपन्यासकार विमल मित्र थे, उन्होंने अपने भाषण में कहा कि देश रूपी लता झुक रही थी, उसे सीधा करने के लिए आपातकाल रूपी डंडा लगाया गया है। सुनकर जेपी हतप्रभ  रह गये। धीमे से बुदबुदाए, ये इतने बड़े लोग ऐसा बोलने से अच्छा चुप क्यों नहीं रहते। मैं चुप रहा, मुझे लगा वे स्वगत  में कह रहे हैं , तभी थोड़ा स्पष्ट उन्होंने कहा, मनोहर , बताओ, ये ऐसा क्यों बोलते हैं ! मैं चकरा गया, कुछ सूझा  नहीं तो मैंने कहा, मैं आपको एक शेर सुनाऊँ। उन्होंने कहा सुनाओ, तो मैंने कहा, ' कद्रदानों की तबियत का है अज़ब रंग आजकल / बुलबुलों को ये हसरत है कि उल्लू क्यों न हुए। ’ जेपी बोले , अरे यह तो बहुत मौज़ूं है। फिर वे उठे अपनी डायरी लाये और फिर सुनते हुए उसे नोट किया। मैंने विनोबा के बारे में कटु बोला, कि उनकी भूमिका संदेहास्पद है, तो एकदम हाथ बढ़ाकर मुझे रोक दिया, 'बाबा के बारे में ऐसा मत बोलो, उन्हें छोटा मत करो।’ पर कुछ  रुक कर, धीमे - धीमे,जैसे ख़ुद से कह रहे हों, बोले यह बात समझ से परे है कि गाय के लिए अनशन पर जनता  के उत्पीड़न पर कुछ नहीं! उन्होंने कहा कि कृष्णमूर्ति अपने को विश्व नागरिक कहते हैं पर भारत में नागरिक दबाया-कुचला जाता है तो कुछ नहीं बोलते ! जेपी एकाएक बहुत निराश हो गए, बोले जो ख़बरें सुनता हूँ उनसे बहुत हताश होता हूँ। वहाँ तुम्हारे यहाँ क्या हाल है, मैंने हाल बताये और कहा कि जबलपुर में इमरजेंसी के कुछ ही पहले आचार्यकुल के सम्मेलन में दादा धर्माधिकारी ने कहा था कि गांधी का आंदोलन कई बार असफल हुआ पर वह कभी पराजित नहीं हुआ और अंतत: सफल, जेपी का आंदोलन भी अंतत: सफल होगा। इसके साथ ही फ़ैज़ का मशहूर शेर भी सुना दिया, 'नाउम्मीद नहीं दिल नाकाम ही तो है / लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।’ जेपी सुनकर मुस्कुराये। फिर चाय आयी। जेपी ने कहा कि मैं नायक साहब के लिए पत्र लिख देता हूँ, उन्हें पहुंचा देना। अपना पैड मंगवाया और लिखा। 28 नवंबर 1976 के इस पत्र में उन्होंने लिखा:

प्रिय गणेशप्रसाद जी,
चि. मनोहर यहाँ मुझसे मिलने और समाचार लेने आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरा हाल तो मनोहर ज़ुबानी बतायेंगे। ... बस चित्त में यही ग्लानि बनी रहती है कि बीमारी ने मुझे इस प्रकार  निष्क्रिय बना दिया है। यह निष्क्रियता कभी-कभी असह्य हो जाती है।
कुछ उपलब्ध साहित्य मनोहर ले जा रहे हैं।
यह लम्बी रात है, जिससे देश गुज़र रहा है। इसमें आप जैसे बंधुओं ने जो मशाल जला रखी है, वही देशवासियों को आने वाले विहान की सूचना दे रहे हैं।
मेरा हार्दिक स्नेह और अभिनंदन स्वीकार करें, अन्य सभी साथियों को भी स्नेह अभिनंदन दें।
आपका भाई 
जयप्रकाश


जेपी के घर पर कुछ दिनों पहले गांधीवादी नेताओं की बैठक हुई थी। उस बैठक की रिपोर्ट भी दादा धर्माधिकारी को देने के लिए  उनके सचिव सच्चिदानंदजी ने मुझे दी। अपने सेवक गुलाब से उन्होंने कहा यह सामग्री आगे चौहारे पर देना, यहाँ पुलिस चेक करेगी। मैंने जेपी के चरण छुए और चल दिया। सीढ़ी पर उतरते हुए मैंने मुड़कर जेपी की तरफ़ देखा, वे मुझे देख रहे थे। वे मुस्कुराये और हाथ हिलाया। बाहर पुलिसवालों को ज़रूरी जानकारी देकर स्टेशन आया। वहाँ एक पोस्टर देखा स्वामी अखंडानंदजी सरस्वती  के प्रवचन का। बहुत अनुनय-विनय के बाद मुझे अमानती घर के इंचार्ज ने बढ़ गए काग़ज़-पत्तर को रखे सामान में रखने की इजाज़त दी। अखंडानंदजी  परम विद्बान संत थे, हमारे कुल गुरु। उनके प्रमुख शिष्य प्रेमानंदजी 'दादा’ हमारे पिता के सबसे छोटे भाई थे। गांधी मैदान के पास उनके शिविर गया। बहुत स्नेह और सुस्वादु भोजन मिला। पिता को जेपी का पत्र पुरुषोत्तम कौशिकजी के हाथ भिजवाया। वे इलाज के लिए विक्टोरिया अस्पताल आये थे।  अगले दिन फिर उनका फ़ोन आया कि कल हड़बड़ी में पत्र के साथ पांच रुपये का नोट भी आ गया था, वह ले जाओ। उन दिनों पांच के नोट में एक दुनिया बसती थी, मैं फौरन साइकिल पर भागा। ...उस रोज़ पटना से चला देर रात तो सुबह वाराणसी पहुँचा तो वहाँ उतर गया। घूमता के दोपहर में काशी एक्सप्रेस से निकला तो शाम को इलाहाबाद उतरने का मन हुआ ,पर उतरा नहीं। वैसे भी यहाँ साल भर बाद आना ही पड़ा। 'अमृत प्रभात’ में पहली नौकरी के लिए। तब पांच साल यहाँ गुज़ारे।
 





 



 
    

गाँधीजी : कुछ आत्मीय प्रसंग

  •  मनोहर नायक 

गाँधीजी की डेढ़ सौंवीं जयंती पर कई देखी-सुनी-पढ़ी बातें याद आयीं। सारी बातें और प्रसंग अत्यंत निकट और आसपास के लोगों से जुड़े हुए हैं, जिनको गाँधीजी का जादुई स्पर्श मिला या जो इस बेजोड़ नेता से जीवन और कर्म में प्रेरित हुए। यह सब याद करते हुए लगता है देश में ऐसे अनगिनत लोग होंगे जिनके प्रियजनों-परिजनों को गाँधीजी का दरस-परस और सामीप्य मिला होगा। लोगों के पास और भी अनूठे, अछूते और प्रेरणादायी संस्मरण सुनाने को होंगे। मैं ख़ुद कई ऐसे परिवारों को जानता हूं और जबलपुर, इलाहाबाद, भोपाल, दिल्ली में अनेकानेक  क़िस्से सुने हैं। जबलपुर जब भी जाना होता है तो ज्ञानजी (कथाकार, सम्पादक ज्ञानरंजन) के साथ सुपर मार्केट कॉफी हाउस में बैठक जमती है। चारेक साल पहले एक दिन उन्होंने कहा कि तुम नहीं जानते अनेक असहमतियां होते हुए भी गाँधी का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव है। सादगी, मितव्ययिता, हिसाब-किताब और जीवन में अनुशासन बहुत कुछ उन्हीं के असर से है। ज्ञानजी का कहना था कि गाँधी बहुत जटिल व्यक्ति हैं और उन्हें जीवन में उतारना बहुत कठिन है। ज्ञानजी उस दिन गाँधी पर काफ़ी बोले। उनके लेखक पिता रामनाथ सुमन मनसा-वाचा-कर्मणा गाँधीवादी थे और वर्धा-सेवाग्राम में कई वर्ष गाँधीजी के पास रहे। गाँधी के विकटपने की मिसाल देते हुए ज्ञानजी ने बताया था कि सुमनजी से किसी हिसाब में ग्यारह पैसे की चूक हो गई तो गाँधीजी ने उनसे कहा कि आप अब दूसरा काम सम्हालिये। ज्ञानजी के पिता- माता दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे | खादी उनके लिये विचार और वस्त्र दोनों थी , घर  खादीमय था | उनकी माँ का निधन 94 वर्ष की आयु में हुआ, वे अंत तक खादी पहनती रहीं। उस दिन ख़ुद अपने जीवन पर पीछे नज़र दौड़ायी तो पाया कि पिता के अनुशासन में ज्ञानजी की तरह मैंने भी घर में गाँधीवाद को काफ़ी सहन किया जबकि तब उससे बाहर की दुनिया काफ़ी दिलकश और दिलदार लगती थी। ज्ञानजी की तरह हमने भी कई बरस खादी ही पहनी। ज्ञानजी ने कहा था कि नौकरी लगते ही सबसे पहले उन्होंने खादी को तिलांजलि दी, 'अरे बड़ा अजीब लगता था, पैंट में थोड़ी देर में ही घुटना बन जाता था।’
गणेश प्रसाद नायक

मेरे जन्म के समय, 1954 में मेरे पिता  गणेश प्रसाद नायक आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए कांग्रेस से समाजवादी पार्टी और फिर जेपी के साथ सर्वोदय में आ चुके थे और उनकी प्रतिष्ठा एक गाँधीवादी नेता की थी। घर में सब कपड़े-लत्ते खादी के थे, एक चिंधी तक सूती नहीं। रूमाल और चौके के छन्ने भी खादी के। पिता तो खादी का व्रत 193० में ले चुके थे। माँ (गायत्री नायक) ने भी अंत तक खादी पहनी। दो अक्तूबर से गाँधी आश्रम खादी भंडार में छूट मिलती थी तो साल भर के कपड़े आ जाते थे। माता-पिता के साथ जबलपुर में जवाहरगंज के खद्दर भंडार कपड़ा खरीदने बरसों गए। यह वह समय था जब घरों की बैठकों में नेताओं की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी रहती थीं। हमारी बैठक में एक बड़ी गाँधीजी की तस्वीर थी, उससे छोटी नेहरू-पटेल-राजेंद्र प्रसाद की थी जिस पर लिखा था 'देश के नेता’। एक जयप्रकाशजी की थी, जिसके नीचे लिखा हुआ था 'सबसे बड़ा धर्म मानवता’। एक फ़ोटो फ़ार्वर्ड ब्लॉक के नेताओं की थी जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ हरिविष्णु कामथ, लक्ष्मण सिंह चौहान (सुभद्राकुमारी चौहान के पति), सवाईमल जैन, शिवप्रसाद चिनपुरिया के साथ हमारे पिता थे। फिर विनोबा के साथ उनकी फ़ोटो और कुछेक अन्य के साथ, एक तस्वीर हमारी माँ की गुरुजी महादेवी वर्मा की थी। हम तीन भाई, एक बहन के बचपन और किशोरवय ऐसी ही यादों से भरपूर हैं। तब 3० जनवरी को 11 बजे हूटर बजने पर लोग ठहर जाते थे, जबकि ठहर जाने की न धौंस थी न दबाव। यह वह समय था जब परिवारों के कपड़ों की अलमारी में गाँधी टोपियां होती थीं। तकलियां सहेज कर रखी जाती थीं। दो अक्तूबर, 3० जनवरी को गाँधी को याद किया जाता था और गाँधी टोपी, चरखा और तकली खुले में निकल आते थे। पिता तो बहुत चरखा कातते थे। वे हाथ काते सूत की माला से ही किसी का स्वागत करते। घर में जब विनोबा आये, जयप्रकाशजी आये तो उनका स्वागत इन्हीं गुंडियों से किया, बाहरी कार्यक्रमों में भी वे यही पहनाते। मीसा में जबलपुर सेंट्रल जेल में उनके बायें कंधे के पास एक हड्डी बढ़ गयी। हाथ में झुनझुनी रहती। वे मेडिकल कॉलेज आते इलाज के लिए पर फ़ायदा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने फिर चरखा  शुरू किया और कातते हुए हाथ ऊपर-नीचे होने से वह दुरुस्त हो गया। घर के पास ही उन्होंने एक बड़ा हॉल बनवाया था जिसमें बाहर से आने वाले सर्वोदयी व अन्य सामाजिक कार्यकर्ता ठहरते। कुछेक को छोड़कर बाक़ी हमारे घर ही भोजन करते। इसे सर्वोदय कार्यालय कहा जाता। शिक्षक संघ, स्वाधीनता संग्राम सैनिक संघ की बैठकें यहीं होतीं। दो अक्तूबर, 3० जनवरी को सुबह सात बजे कार्यक्रम होता जिसमें आमतौर पर सेठ गोविंद दास और महेशदत्त मिश्र मौजूद रहते। गोविंद दास तो समय के पाबंद थे, वे सबसे पहले पहुंचते। फुआरे पर नगर कांग्रेस कमेटी की सभा शाम को होती। ऐसा ही एक दिन 12 फरवरी का होता। इस दिन गाँधीजी की भस्म नर्मदा में विसर्जित की गयी थीं। पिता नर्मदा के तट तिलवारा घाट में सर्वोदय मेला आयोजित करते। काफ़ी लोग इकट्ठे होते। हम बच्चे नगर निगम के ट्रक पर पहले पहुंच जाते। शामियाना लगता और लाउडस्पीकर में गाने शुरू हो जाते.... 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की यह अमर कहानी’, 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।’ प्रार्थना होती, कताई होती। गोविंद दास जी, व्यौहार राजेंद्र सिंह, भवानी प्रसाद तिवारी, सवाईमल जैन, महेशदत्त मिश्र, रामेश्वर  प्रसाद गुरु तमाम लोग आते, भाषण होते। कई बार दादा धर्माधिकारी के अद्भुत भाषण सुनने को मिलते।
देखते ही देखते दो अक्तूबर, 3० जनवरी और 12 फरवरी के आयोजनों में बाद में बमुश्किल लोग जुटते , और एहसास होने लगा था कि गाँधीजी का महत्त्व कम होने लगा है | जल्दी ही वह दौर भी देखा जब गाँधी मजबूरी का नाम हो गये... अब एक बार वे फिर मज़बूती के पर्याय हैं।
गाँधीजी का बाहर जो हाल हो रहा हो, उनसे एक रिश्ता बन गया, यह नेहरूजी से भी बना। जबलपुर की मुख्य सड़क पर जवाहरलाल को 'ऋतुराज’ की तरह निकलते देखा था। बाद में दोनों को लेकर उलझनें भी पेश आयीं पर दिल से उनकी सरदारी नहीं गयी। यह मामला वैसा ही था जैसा खुशवंत सिंह ने लिखा था कि बापू के शराब और ब्रह्मचर्य संबंधी विचार बेहद अटपटे हैं लेकिन मैं नहीं चाहता कि उनकी जो मूर्ति मन में है उसे कोई ठेस पहुंचे। पिता वैसे तो ज़रा सी ग़लती पर भी आवेश में आ जाते थे लेकिन उनकी मूल प्रकृति शांत, प्रसन्न और उदार थी। परसाईजी  ने एक बार मुझसे कहा था कि नायक जी के होंठों पर हंसी और नाक पर ग़ुस्सा रहता था | मैट्रिक करने के बाद उन्होंने कहा कि इतने साल में यदि खादी के संस्कार नहीं बने तो अपनी मर्ज़ी का पहनो और घर में फिर सूती और टेरीकॉट का बेधड़क प्रवेश हुआ। पर पिता ने तो घोर ग़रीबी के दिनों में खादी का संकल्प लिया था और तीन काम तय किये थे, पढ़ना, इसके लिए ट्यूशन करना, ताकि आधिकाधिक स्वावलम्बी हों और आज़ादी के लिए काम करना। यह 193० की बात है, तब वे सत्रह के थे। दो साल बाद खादी दुगनी महँगी हो गयी। पिता ने गाँधीजी को लिखा कि मेरा जैसा छात्र इस गरीबी, महँगाई में खादी का संकल्प कैसे निभाये? उनका पोस्टकार्ड आया, 'डियर गणेश प्रसाद, वेयर देअर इज़ ए विल, देयर इज़ ए वे। कट शार्ट यूअर एक्सपेंसेस, बापू |'
सन् 33 में गाँधीजी संभवत: पहली बार जबलपुर आये थे। एक सभा में पिताजी गाँधीजी के सामने बैठ गए, वे उन्हें एकटक देखे जा रहे थे, तब गाँधीजी ने उनसे कहा, ऐसे मत देखो, ध्यान बँटता है। इसी समय एक सभा हमारे मोहल्ले दीक्षितपुरा के उपरैनगंज वार्ड में स्थित सिमरिया वाली रानी की कोठी में हुई। प्रसंगवश, माखनलालजी चतुर्वेदी ने इसी कोठी से 'कर्मवीर’ निकाला था। तब उनका प्रेस भी यहीं था। गाँधीजी की यह सभा महिलाओं की थी। इसके बारे में मुझे मेरी माँ के ताऊजी के पुत्र मामा जीवन नायक ने, जो उस समय ग्यारह वर्ष के थे, बताया था। इसी कोठी के पीछे गली में हमारा ननिहाल 'नायक निवास’ है। मामाजी अपनी माँ को लेकर वहां गये थे। भाषण के बाद गाँधीजी झोली फैलाकर एक-एक कतार में गये और चंदा लिया। झोली भरने पर वे जाकर एक जगह उसे उलट आते। घर लौटते हुए मामाजी को उनकी माँ ने बताया कि वे कान के झुमके दे आयी हैं। माँ को छोड़कर मामाजी फिर वहां आ गये। तभी एक सज्जन ने कहा कि कान की एक बाली नहीं मिल रही है। गाँधीजी जा चुके थे , उन्हें जाकर बताया गया तो उन्होंने कहा, 'कोई माँ, बहन बापू को एक कान का गहना नहीं देगी। देगी तो दोनों। न दे तो एक भी न दे। और तलाश करो।’ अंत में गाँधीजी की बात को सही ठहराता दूसरा झुमका दरी के धागे में फंसा हुआ मिल गया।
दूसरे विश्व युद्ध में गाँधीजी ने जनता से अपील की कि भारत को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ युद्ध में घसीटा जा रहा है इसलिए वह युद्ध में धन-जन की कोई मदद न करे। इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू करते हुए सत्याग्रहियों का चुनाव अपने हाथ में लिया। सत्याग्रहियों की नैतिक व चारित्रिक मर्यादाएं निश्चित कीं। सत्याग्रह की विधि निर्धारित की। विनोबाजी को प्रथम सत्याग्रही बनाया। पिता का नाम नगर की पहली सूची में था पर गोविंद दास और द्बारिका प्रसाद मिश्र ने उनसे कहा कि सूची के मुताबिक सत्याग्रह होने पर बाद में तो सत्याग्रह कराने वाला कोई न होगा इसलिए तुम बाद में सत्याग्रह करना, तब तक सत्याग्रही तैयार करो और अपनी परीक्षा भी दे लो। नियम यह था कि सत्याग्रही पुलिस को सूचना देते थे। समय, स्थान बताते थे, पुलिस उन्हें सत्याग्रह करने के पहले ही गिरफ़्तार कर ले जाती थी। मार्च में पिताजी की परीक्षा हो गई। दूसरी लिस्ट तक पुलिस गिरफ़्तार करती रही, लेकिन फिर तीसरी लिस्ट के सत्याग्रहियों की गिरफ़्तारी बंद कर दी। पहले ही नहीं सत्याग्रह के बाद भी गिरफ़्तारी रुक गयी। पिता नई-नई विधि से तब भी गिरफ़्तारी कराते। पिता ने अपने सत्याग्रह का दिन तय कर लिया था पर इसके पहले मूलचंद यादव नाम के सत्याग्रही की गिरफ़्तारी आवश्यक थी। पिताजी ने एक परचा बनाया कि सरकारी कर्मचारी युद्ध में सहयोग न करें। इसकी कई प्रतियां टाइप करायीं। सत्याग्रही की यूनीफार्म बनायी - सफ़ेद पेंट, सफ़ेद कमीज़, गाँधी टोपी और झोला। सत्याग्रही से कहा कि कचहरी की शांति भंग न करे, न कोई नारा लगाये। सिर्फ़ कहे कि गाँधीजी का संदेश देने आया हूँ। उसे सबसे पहले सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में पूरे सम्मान के साथ पत्र देना था। जब सत्याग्रही पत्र लेकर बाहर निकलने लगा तो मजिस्ट्रेट ने उसे रोककर पुलिस बुलाकर जेल भेज दिया, इसी की उम्मीद थी। इस सत्याग्रही की अनोखी विधि की अख़बारों में चर्चा हुई। लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस विधि को गाँधीजी के विचारों के विपरीत बताकर उस सत्याग्रही को अमान्य कर दिया। पिता ने गाँधीजी को पत्र लिखा कि सत्याग्रहियों की गिरफ़्तारी न होने से यह विधि अपनायी, जोकि किसी भी तरह आपके उसूलों का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने गाँधीजी को मजिस्ट्रेट को दिये पत्र की कॉपी भी भेजी। इसके बाद पिता सत्याग्रह करने के पहले ही गिरफ़्तार हो गए। पहले वे जबलपुर जेल में रहे फिर नागपुर भेज दिये गए, जहां उन्हें सूचना मिली कि गाँधीजी ने प्रदेश कांग्रेस के फ़ैसले को रद्द करने का आदेश देते हुए सत्याग्रही को मान्य घोषित किया और कहा कि उस लड़के ने बहुत ही सूझबूझ से काम लिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गिरिजाशंकर अग्निहोत्री ने प्रेस को इस फ़ैसले की सूचना दी थी। नागपुर जेल से छूटकर  पिताजी सीधे सेवाग्राम गए। दिन भर गाँधीजी की कुटी के बाहर खड़े रहे। शाम को महादेव देसाई मिले उन्होंने घूमते समय गाँधीजी से भेंट करने को कहा, तभी गाँधीजी कुटी से निकले और पिता पर नज़र पड़ी तो पूछा, कहां से आये हो? नागपुर जेल से सुनकर बोले, तो भोजन कर लो। नागपुर जेल में कैदियों द्बारा काता तीन सेर सूत भेंट करने पर गाँधीजी बोले, 'बहुत कम काता।’ इत्तफ़ाक यह हुआ कि भोजन की पांत में गाँधीजी पिताजी की बगल में आकर बैठ गए और दोने में जैसे ही दाल परसी गई उन्होंने लहसुन की भुसी की पुड़िया खोल के अपनी दाल में और फिर पिताजी की दाल में डाल दी। पिताजी प्याज-लहसुन नहीं खाते थे , पर उस दिन जी कड़ा करके दाल पी। नागपुर जेल में लड़कर उन्होंने राजनैतिक कैदियों के लिए किचन खुलवाया था और जब वहां सब्ज़ी में प्याज पड़ी तो उसे बंद करने के लिए उपवास कर दिया। वे अपनी पर अड़ने वाले व्यक्ति थे , अंत में उनके हिसाब की एक अलग छोटी किचन और बनी। जेल में उन्हें उपाधि दी गयी थी, 'कुछ झुकी कमर पर ज़ोर दिये/ डिक्टेटरशिप का बोझ लिये/ सुबह चार बजे उठ चरखा कातें/ मुँह में मीठे बोल लिये।’ जेल में  लड़कर और फिर अनशन करके उन्होंने लोहे के तसले में खाना देना बंद करवाया था। दूध बंद होने पर सत्याग्रह शुरू करवाया था। ... भोजन के बाद टहलते हुए उन्होंने गाँधीजी को दूध बंद होने की बात बतायी। गाँधीजी ने कहा तुम नागपुर वापस जाकर सत्याग्रह बंद करने का संदेश दो और घर जाकर इस पर वक्तव्य दो, वे ख़ुद भोजन में दूध की आवश्यकता पर सरकार को लिखेंगे। बाद में जेल में भोजन की जाँच पर कमीशन बना, जिसने आठ ओंस दूध ज़रूरी माना। तब से जेल में 6० से 4०० ग्राम तक दूध मिलने लगा | पिता ने जीवन भर संघर्ष किया पर गांधी- प्रेरित सिद्धांतों से कभी डिगे नहीं... कई बार जेल यात्राएँ कीं, मीसाबंदी भी रहे, पर कभी पैरोल नहीं लिया | 1944 में अपने पिता की मृत्यु पर उनके के अंतिम दर्शनों के लिए पैरोल नहीं लिया।
हमारे नाना गोपाल प्रसाद नायक स्वाभिमानी, स्वावालम्बी और स्वाध्यायी थे। 'सरस्वती’ के
गोपाल प्रसाद नायक 

संपादक समालोचक और साहित्यकार महावीर प्रसाद द्बिवेदी के प्रिय छात्र रहे | द्बिवेदीजी पहले कंपनी सरकार की जीआईपी रेलवे में थे। झांसी स्टेशन पर उनकी मूर्ति भी है। वे नाना को रेलवे में लाना चाहते थे और मौक़ा पाकर वे उन्हें रेलवई में ले आये। नाना अपने काम में बहुत ही मेहनती और ईमानदार थे। देशप्रेम की भावना से भरपूर थे। जबलपुर-इलाहाबाद के बीच के स्टेशनों पर वे रहे। पता चलता कि अमुक नेता फलां गाड़ी से निकल रहा है तो गाड़ी रुकवाकर नेता को दूध-फल भेंट करते। वे पहले स्टेशन मास्टर थे , जो अपनी मांगों को लेकर पूरे स्टाफ़ के साथ हड़ताल पर बैठ गए। अगस्त 42 में उन्होंने स्टेशन पर तिरंगा फहरा दिया। वे निलंबित हो गये और एक साल बाद जब लिये गए तब बहुत छोटे स्टेशनों पर उन्हें रखा गया। उनकी एक चचेरी बहन सुमित्रा थीं, जो कम उम्र की थीं और एक साल में विधवा हो गयी थीं। उनके पिता ने सुमित्रा को इनके पास भेज दिया। सुमित्रा की हालत देख उनका हृदय विदीर्ण हो गया। प्रण किया जब तक इसका फिर विवाह न करेंगे अन्न नहीं खायेंगे। यह 193० की बात है। कपड़ों, सजधज और खाने के शौकीन गोपाल प्रसाद मोटा पहनने लगे। अलोना खाने लगे। कमलगटा, कसेरू, महावरी, मूंगफली, सिंघाड़ा और ऋतुफल यही आहार हो गया। पान, तम्बाकू, भाँग और खुशबूदार तेल - फुलेल सब बंद। उनकी दो बेटियां और उनसे बड़ा एक बेटा था। यह निश्चय भी किया कि अब उनकी संतान नहीं होगी। वे सूत कातने और रामचरित मानस के परायण में रम गए। सुमित्रा इस बीच मिडिल पास हो गयीं। नाना ने गाँधीजी को पत्र लिखकर संकल्प के बारे में बताया। उन्होंने कहा, निर्णय बेशक सही है पर विधवा-विवाह के लिए समाज तैयार नहीं है। यह क्रांतिकारी काम है। ब्राह्मण वर्ग तो कदापि तैयार न होगा। याद रहे कोई साथ न देगा। सगे-संबंधी मुँह फेर लेंगे। पर क्या विघ्न के भय से पीछे हट जाओगे? संकल्प लिया है तो पूरा करो। हिम्मत रखो, भगवान पर भरोसा रखो। मालवीयजी ने भी ऐसा ही लिखा। महावीर प्रसाद द्बिवेदी ने उन्हें 'बाल विधवा-विलाप’ शीर्षक अपनी कविता भेजी और लिखा, 'मैं विधवा-विवाह को धर्मसंगत मानता हूं और हिंदू-धर्म की कठोर रूढ़ियों के विरुद्ध हूं। लोग निंदा करें या स्तुति - इस पर हर्ष-विषाद में न पड़कर जो ठीक समझ रहे हो वही करना। अंतत: तीन साल बाद रानीपुर में विवाह हुआ। नाना तब वहीं स्टेशन मास्टर थे। पिता और भाइयों के सिवा कोई नहीं आया। जमींदार, जागीरदार आसपास के आये, मित्र मंडली आयी और धूमधाम से विवाह हुआ। इतने साल बाद जब नाना ने नमक वाला भोजन किया तो जीभ में छाले पड़ गए। शादी में विदा के समय 'सम्राट’ उपनामधारी कवि ने नाना को एक मानपत्र दिया, जिसकी कुछ पंक्तियां ये थीं: 'गोपाल तुम्हारी वीणा ने यह छेड़ी तान निराली है/ जिसकी धुन मोहक है सबको मदमस्त बनाने वाली है/ तुमने सचमुच नायक बन कर यह अनुपम सुयश कमाया है/ जो लता शुष्क थी उसका तुमने जीवन सरस बनाया है।’ शादी में बारातियों को चाँदी की तकली भेंट की गयी थी। वे जाति से निकाल दिये गए पर कुछ साल बाद झांसी में जिझौतिया ब्राह्मणों के अधिवेशन में वापस ले लिये गए। मेरी माँ का वहां जुलूस भी निकला , क्योंकि वे समाज की पहली मैट्रिकुलेट लड़की थीं।
नाना जबलपुर में वड़ोदरा की लड़कियों की प्रभात फेरी देखकर इतने प्रभावित हुए कि अपनी
मां गायत्री नायक

सात-आठ साल की बेटियों को वड़ोदरा पढ़ने भेज दिया। कई साल पहले इन्हीं शारदेय नवरात्र के दिनों में माँ ने मुझसे कहा था कि आजकल तो टीवी पर गरबा देखो तो सब कहीं ये फ़िल्मी गानों पर होते दिखते हैं। तुम कल्पना नहीं कर सकते कि बहत्तर साल पहले हम छोटी-छोटी लड़कियां वड़ोदरा की स्कूल में यह गाते हुए गरबा करते थे, यह कहते हुए उन्होंने गाते हुए वह पंक्ति सुनायीं, ' देसड़िया नी भाजे गंधीजी  अवे गांड्यो तो ' , जिसका अर्थ था कि 'ये गाँधी तो देश के लिए पागल हो गया है’ - इसे ही गाते हुए माँ और सहेलियां गरबा किया करती थीं। वड़ोदरा में भाषा, खानपान की दिक़्क़त थी तो नाना ने दोनों को इलाहाबाद में महादेवीजी की महिला विद्यापीठ में भेज दिया। सावित्री मौसी तो थोड़े समय रहीं पर माँ छठवीं से एम.ए. तक वहीं पढ़ीं और महादेवी की प्रिय छात्रा रहीं। यहीं जब वे छठी-सातवीं में ही थीं तब गाँधीजी हिंदी साहित्य सम्मेलन के किसी कार्यक्रम में आए। वहां स्कूल की छात्राओं के साथ माँ को 'वंदे मातरम्’ गाना था। जब वे गाँधीजी के सामने से निकलीं तो उन्होंने उनका हाथ पकड़कर पूछा, 'वंदे मातरम् गाओगी।’ हां, कहने पर पीठ पर एक धौल जमाते हुए गाँधीजी ने कहा 'ज़ोर से गाना।’ गाँधीजी की भस्म जब गंगा में विसर्जन के लिए  इलाहाबाद आयी तब माँ रामधुन गाती पैदल संगम तक गयी थीं।... 
जीवन नायक

हमारे जीवन मामा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में दाखिले के प्रत्याशी थे। उन्हें स्टेशन के सामने रीवां कोठी में कमरा मिल गया था। रीवां राज्य परिवार के लाल पद्मधर सिंह वहीं रहते थे। वे विद्यार्थी आंदोलन के नेता थे। मामाजी उनके करीब आये और आंदोलन में समय देने लगे। यह सन् 42 का वक़्त था एकाएक आंदोलन उग्र हो गया। पुलिस ने गोली चलायी और पद्मधर सिंह का प्राणांत हो गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ भवन का नाम उन्हीं के नाम पर है और उनकी प्रतिमा भी वहां लगी हुई है। मामाजी बताते थे कि पद्मधर माखनलाल चतुर्वेदी की दो पंक्तियां, अक्सर गुनगुनाया करते थे: 'जो कष्टों से घबराऊं, मुझमें कायर में भेद कहां/बदले में ख़ून बहाऊं, तो मुझमें डायर में भेद कहां।’
इस घटना के बाद मामाजी का नाम विश्वविद्यालय से ख़ारिज हो गया। मामाजी तब बंबई आ गए और एक परिचित के साथ दादर में रहने लगे उन्हें वहीं के डिसल्वा पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने का काम मिल गया। उनकी बिल्डिंग के पास ही सड़क पार आराम बिल्डिंग थी जहां वे ट्यूशन पढ़ाते थे। एक दिन तीसरी मंजिल से सीढ़ियां उतरते उनकी मुलाक़ात उत्तमराव से हो गयी जो फ़ोटो-पत्रकार थे। कुछ अंग्रेजी समाचारपत्रों के लिए नियम से लिखते थे और 'द ओरिएंट’ के अधिकृत संवाददाता थे। उन्होंने मामाजी के बारे में सभी जानकारियां जुटा रखी थीं। उन्होंने अपनी मंशा बतायी तो ट्यूशन के बाद मामाजी एक घंटा का समय उन्हें देने लगे। टेलीफोन के संदेश लिखना आदि काम था। चाय और खाने की सामग्री के अलावा पढ़ने को भी काफ़ी कुछ रहता। मामाजी के शब्दों में : 'सन् 42 का अगस्त आ गया था। शुरू से ही बंबई के वातावरण में अकुलाहट छा रही थी। कांग्रेस के बड़े नेता आ रहे थे। माहौल में बेचैनी और छटपटाहट थी। पहला हफ़्ता बीता कि ऐलान हुआ कल शिवाजी पार्क में सभा है, गाँधीजी बोलेंगे। भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पर न गाँधीजी आए न सभा हुई। लेकिन उनका संदेश सब कहीं पहुंच गया - 'तुम्हीं सिपाही हो, तुम्हीं नेता हो। करो या मरो।’ सभी की ज़ुबान पर था, 'करो या मरो।’ फिर एक ख़बर आग की तरह फैली- 'गाँधीजी पकड़ लिये गए, सारे नेता गिरफ़्तार हो गए।’ एक सनसनी और बौखलाहट फिर चिल्लाहट में बदल गयी, 'अंग्रेजों भारत छोड़ो।’ सड़क को अवरुद्ध किया जाने लगा। रस्से बांध कर खम्भों को सड़क पर लिटा दिया गया। घर का बेकार सामान सड़क पर आ गया। लड़के रातभर खंभे पीटते रहे, 'धन्न-धन्न।’ उस रात शायद ही कोई सोया। सुबह यातायात ठप्प था। दोपहर में सेना आ गयी। लोगों को पकड़कर अवरोध उठाये जाने लगे।’ मामाजी से रहा नहीं गया तो वे जैसे-तैसे 'आराम,’ बिल्डिंग पहुंचे और पढ़ने वाले बच्चों के लिए घंटी बजाई तो दरवाज़ा खुलने से पहले दो सर्जेटों ने बंदूकें अड़ा दीं और कहा नीचे चलकर सड़क साफ़ करो। तब तक दरवाज़ा खुल चुका था, मामाजी ने लड़कों से उत्तमराव को सब बताने को कहा। नीचे कई लोग कतार में थे। बाद में एक में ट्रक में लादकर कोतवाली लाकर एक-एक छोटे-से  कमरे में कई-कई लोग ढूंस दिए गए। रात में मामाजी की तंद्रा तब खुली जब एक सिपाही ने उनसे कहा बाहर चलो। बाहर उत्तमराव थे। लड़कों ने उन्हें बता दिया था। पुलिस अधिकारी ने मामाजी को उनके हवाले किया और उत्तमराव की बेबी आस्टिन में वे चल दिये। रास्ते में उत्तमराव ने धीरे से कहा, पता चला है कि बापू पुने में हैं। दो बजे गाड़ी है। अपन चलेंगे। उनका दर्शन करेंगे। मैं सुतार (बढ़ई) बनूंगा तुम मेरे मददगार। दूरबीन का इंतज़ाम है। तुम खाना खाकर एक घंटे सो लो। फिर दोनों ने ट्रेन पकड़ी। पौने दो घंटे में ठिकाने लगे। बाहर निकलकर तमिलभाषी उत्तमराव ने मराठी में बात कर एक टैक्सी वाले को तैयार किया और सीधे चलने को कहा, जब टैक्सी मुख्य सड़क पर आयी तो थोड़ा चलकर उतर गए और एक दिशा में इशारा करके बोले अपन को वहां टीले तक चलना है। पत्थर और झाड़ियां हैं, सम्हलकर। अपने पास 45 मिनट हैं। पसीने से लथपथ दोनों 38 मिनट में वहाँ पहुंचे। उत्तमराव ने दूरबीन तैयार की। साफ़्टवुड के छह टुकड़े थे, एक दूसरे में फिट होने वाले। उनमें शीशे फंसाने के लिए खांचे थे। सबको जोड़कर दूरबीन बन जाती थी। ऊपर लगे शीशे पर सामने की चीज़ का अक्स पड़ता था जो नीचे के शीशे में दिखायी देता था। मामाजी पास ही लेट गए। फिर एक कंकड़ उन्हें लगा। आँखें खोलीं तो उत्तमराव इशारे से बुला रहे थे। पौ फट चुकी थी। उजाला फैल गया था। यह गाँधीजी के सुबह की सैर का वक़्त होता है। उत्तमराव ने दूरबीन से सिर हटाया और कहा, 'देखो! भगवान का लाख-लाख शुक्र!’ अगस्त ’42 की वह नौ तारीख की सुबह थी। मैंने दूरबीन से देखा आगा खां महल के प्रांगण में सफ़ेद चादर ओढ़े गाँधीजी फुर्ती से टहल रहे हैं। बाद में लौटकर उत्तमराव ने यह ख़बर भेजी और उनका अख़बार संभवत: यह ख़बर पहले पहल देने वाला बना।
गाँधी शताब्दी के समय 1969 में गाँधी साहित्य प्रचार के लिए जबलपुर नगर निगम प्रशासक एलपी तिवारी ने एक रुपये महीने पर पिताजी को दूकान दी थी, अच्छे साहित्य के प्रचार के लिए। इस सत्साहित्य ग्रंथागार में गाँधी-विनोबा और अन्य साहित्य मिलता था। पहले मैं उसमें बैठता था तो गाँधीजी की लिखी और उन पर लिखी कई किताबें पढ़ीं। अब मेरे छोटे भाई जयप्रकाश बैठते हैं। इस दुकान को भी पचास वर्ष हो गए। उस समय आसपास ऐसे अनेक लोग थे जो गाँधी के अनुयायी थे।   शहर और बाहर के  पिताजी के मित्र हमारे तमाम  चाचा गांधी की गोपियां थे | ये स्मृतियां बताती हैं कि गाँधीजी ने लोगों को किस गहराई से प्रभावित किया |आज के कठिन और उद्विग्न समय में गाँधीजी के साथ उन सबको याद करना बेहद ज़रूरी है... वैसे तो, इनकी 'जस की देह को जरा मरन नहीं होय!'
(पिछले साल सत्य हिंदी.कॉम में प्रकाशित)





 
    

द्वार‍िका प्रसाद म‍िश्र: सत्ता की चमक, सत्ता का नशा

  •  मनोहर नायक 

द्वारिका प्रसाद मिश्र का स्वतंत्रता सेनानी और उस दौर के बड़े नेता के तौर पर आदर रहा है... लेकिन लोकल पैट्रीअटिज़म (patriotism) के नाम पर कसीदे पढ़े जाना उचित नहीं है, तर्कसंगत और संतुलित होना और ज़रूरी है। कांग्रेस सदैव मध्यमार्गी पार्टी के बनिस्बत एक जमावड़ा रही है, जिसमें धुर वामपंथियों से लेकर दक्षिणपंथी, समाजवादी, उदारवादी और ठेठ कांग्रेसी सभी सहअस्तित्व और सहअलगाव के साथ गुज़र करते रहे... इनमें मुख्यत: मिश्र, मालवीय, टंडन, शुक्ल आदि का झुकाव दाहिनी ओर था पर वे सब संघ समर्थक थे, ऐसा भी ज़रूरी नहीं। सरदार पटेल गांधीजी से वचनबद्ध थे और नेहरूजी से पुरानी कामरेडरी थी, इसलिए वे नेहरूजी के तरफ़दार और अनुकूल बने रहे, वरना वे भी दायीं बाजू झुके हुए थे.. संगठन पर उनका क़ब्ज़ा था, जिसके कारण जवाहरलाल के चाहते हुए भी समाजवादियों को कांग्रेस से बाहर होना पड़ा था, एक समय तो वे संघ का कांग्रेस में विलय भी कराना चाहते थे, जो सौभाग्य से नेहरूजी के कारण नहीं हुआ।
राजेंद्र बाबू का सोमनाथ प्रसंग तो बहुचर्चित है ही...पटेल के परिदृश्य से जाने के बाद नेहरू समाजवादियों को बुलाते रहे ताकि मध्य और वामपंथियों का कांग्रेस में पलड़ा कुछ भारी हो और वे अपने 'साइंटिफ़िक टेम्पर’ के विचार पर तेज़ी से आगे बढ़ सकें, पर लोहियाजी के कारण यह संभव न हुआ... लोहियाजी विलक्षण मेधावी और प्रखर राजनीतिक थे, आमजन से लेकर बुद्धिजीवियों तक उनका असीम प्रभाव था, जो उन्होंने अंध-नेहरू और कांग्रेस विरोध में उल्खर्च दिया, मेरे हिसाब से इस तरह स्वतंत्रता के बाद इंदिरा गांधी नहीं , राममनोहर लोहिया भारतीय राजनीति के पहले प्रतिहिंसक राजनीतिक थे...  उनकी तरह नेहरूजी के घोर विरोधी कृपलानी और मसानी भी थे पर लोहियाजी का मामला my way is high way वाला था इसलिए दोनों किनारा कर गए... जेपी, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता तो ख़ैर विरोधी होते हुए भी लोहियाजी जैसे कटु नहीं हो सकते थे, इसलिए ये क्रमश: सर्वोदय, अध्यात्म और कांग्रेस में चले गये।
इससे हुआ यह कि नेहरू कमज़ोर पड़े, इस अर्थ में भी कि संघ हर तरह से उन्हें हर बात का दोषी ठहराने में लगा हुआ था, लोहियाजी के अंधाधुंध विरोध ने उसकी मदद की |  इंदिराजी के बाद तो कांग्रेस में भी नेहरू एक हद तक दरकिनार  हुए... सामने सिर्फ़ इंदिरा-राजीव-सोनिया  रह गए | इससे जिस नेहरू को आज़ाद भारत में लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा प्रतीक बनना चाहिए था, वे सारी बुराइयों की जड़ मान लिये गये... वह तो उनका किया-धरा-बनाया हुआ इतना है कि उनकी हस्ती मक़बूलियत से क़ायम है। इससे पहले नेहरू के ख़िलाफ़ आवाज़ द्बारिका प्रसाद मिश्र ने उठाई, जनसंघ के अध्यक्ष के लिए उनका नाम हवा में था ही... मूल योजना में कहते हैं तीन लोग थे, रविशंकर शुक्ल, गोविन्द दास और मिश्रजी। इनमें से दो ऐन मौक़े पर खिसक लिए और मिश्रजी बोलकर अड़धप में आ गए. वे कांग्रेस से बाहर कर दिए गए, पर वे संघम्-शरणम् होने की हिम्मत नहीं जुटा पाये, वे समाजवादियों की मदद से उपचुनाव लड़े, चुनाव चिन्ह था दीपक... उनके मुख्य चुनाव संचालक थे मेरे पिता गणेश प्रसादजी नायक और भवानी प्रसादजी तिवारी थे... जीतते-जीतते मिश्रजी कांग्रेसी तिकड़म से हार गए। कांग्रेस में वापसी पर शायद मढ़ाताल मैदान में स्वागत सभा हुई थी, जिसमें मैं गया था, पर कुछ समझ नहीं आया था, लेकिन घर में बड़ों की बातों से यह पता चला कि उनकी वापसी को वनवास से वापसी कहा गया था, क्योंकि वे एक दशक से अधिक कांग्रेस से बाहर रहे।
मिसिरजी ने राजनीति में  सकल कर्म किये.... बदले की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी... गोविन्द-द्बारिका की एक ज़माने में प्रसिद्ध जोड़ी के टूटने और गोविन्द-परिवार से बदले को लेकर अनेक कहानियाँ चर्चित रही हैं, बखरी के बरक्स उन्होंने बिड़ी वालों का गुट खड़ा किया।
मिश्रजी में अतिशय दम्भ भी था, जिसे कई बार ग़लती से स्वाभिमान समझ लिया जाता था। बहरहाल, वनवास से लौटने पर उन्हें राजपाट भी मिला। मिश्रजी सत्ता के व्यक्ति रहे हैं। सत्ता से उनमें चमक आती थी, और नशा भी। सत्ता की इस चमक को भोलेभाले पत्रकार लोकप्रियता मान बैठते हैं। पत्रकार कुंजबिहारी पाठक के तो वे 'प्रदेश प्राण’ थे, जो कि शायद वे कभी नहीं रहे, हाँ प्रदेश के महज़ मुख्यमंत्री ज़रूर रहे। उनके काल में घोटाले हुए। बस्तर गोलीकांड में आरोपों में घिरे। यह कांड उनके अहम् का ही विस्तार था। चुनाव धांधली  में ग्रस्त हुए... लोकप्रियता का आलम यह था कि उसी दौरान तिलक भूमि तलैया की सभा में जनक्षोभ के कारण उन्हें भागना पड़ा, चप्पल भी छूट गयी। वृंदावन दुबे आड़ करते हुए उन्हें निकाल ले गए। जाते-जाते मिश्रजी धमका गये, कि मैं जानता हूँ कौन कर रहा है यह, मैं देख लूंगा। इसका बदला उन्होंने जबलपुर और महाकौशल से लिया, उनके कार्यकाल में कोई विकास कार्य यहां नहीं हुआ।
यह उनका अहंकार ही था जिसके कारण वे सरकार से हाथ धो बैठे। दिलचस्प यह कि यह कारनामा उसी जनसंघ ने किया जिसके वे अध्यक्ष बनने वाले थे। संंविद सरकार का तिलिस्म लोहियाजी का रचा हुआ था। मधु लिमये इस प्रयोग में जनसंघ का साथ न लेने के लिए डाक्टर लोहिया से आग्रह करते रहे पर ग़ैरकांग्रेसवाद के प्रणेता बहुत जल्दी में थे।
राजनीति की विडम्बना देखिये... जाने - अनजाने, लोहियाजी ने मध्यप्रदेश में तो कम से कम कांग्रेस के नेहरू-विरोधी, उस दक्षिणपंथी ख़ेमे के एक नेता, मिसिरजी को , ध्वस्त कर दिया, जिसने समाजवादियों को कांग्रेस से बाहर किया था। यह लिमये ही थे जिन्होंने जनसंघ की दोहरी सदस्यता के मामले को ऐसा तूल दिया कि भावरूपेण जनता पार्टी फिर अपने घटकों में फ़र्द- फ़र्द  हो गयी और तब जनसंघ भाजपा के नाम-रूप में उभरी। वैसे जनसंघ कुछ समय और जनता पार्टी में रहता, पर अंतत: मुझे अलग होना ही था, क्योंकि उसका अपना संघ वाला कट्टर राष्ट्रवादी-हिंदुत्ववादी सूत्रबद्ध एजेंडा था, जनता पार्टी तो उस दिशा में उसका एक पड़ाव या क़दम था।
यह भी ग़ौरतलब है कि मिश्रजी आगे चलकर कांग्रेस हाईकमान में प्रमुख व्यक्ति बने, जबकि जबलपुर ही नहीं प्रदेश में कांग्रेस की जो हालत है उसके बीज उन्होंने ही बोये। बरसों बखरी-पटेल गुट झों-झों करते रहे। आज दोनों खलास हैं। हालत यह है कि उनके बाद महाकौशल से कोई मुख्यमंत्री ही नहीं बना। उनका एक शगल बाहर से लोगों को प्रदेश में बैठाना था। विश्वविद्यालयों में ऐसा वे करते रहे। बिहार के मुंदर शर्मा संपादक बन गए पर मिसिरजी ने उन्हें पीसीसी का अध्यक्ष भी बनवा दिया। इंदिरा के ज़माने  में जनाधार वाले नेताओं के बदले  संगठन में अपने मोहरों को ऊंचे पदों पर बैठाना आम चलन था | कांग्रेस जब विभाजित हुई तब ज़्यादातर बुजुर्ग, निजलिंगप्पा, कामराज, अर्स सब संगठन कांग्रेस में थे। इंदिरा गांधी को भी अपने ख़ेमे की प्रामाणिकता के लिए कुछ खूसट सीनियरों की ज़रूरत थी। इनमें दो उन्नावी टेलेंट उन्हें मिले, मिश्रजी और उमाशंकर दीक्षित। मिसिरजी ने यहाँ वही काम किया जिसमें वे माहिर थे- उठाने-गिराने का काम, मोहरों की अदला-बदली का काम। 'दिनमान’ उन्हें 'कलह विशेषज्ञ’ लिखता रहा। इंदिरा गांधी पर कांग्रेस के ओजहरण, उसे कठपुतली पार्टी बना देने का आरोप है। क्या इसका कुछ हिस्सा उनके सलाहकारों को समर्पित नहीं करना चाहिए? सत्ता ही मिश्रजी की बैटरी थी, पार्टी जब ताक़तवर थी, तब ही वे 'चाणक्य’  हो पाये।
मिश्रजी पढ़े-लिखे अत्यंत समझदार नेता थे। राजनीति, शासन, पत्रकारिता, साहित्य सबके अनुभवी, अंतरदृष्टि सम्पन्न। एक ज़माने में जुझारू भी रहे होंगे। किताबें लिखीं, महत्वाकांक्षी 'कृष्णायन’ पर आरोप लगे। ग़ालिब के शेरों का दोहाकरण बेहद दोयम दर्ज़े का काम था। अपनी आत्मकथा लिखी। मिश्रजी का मामला स्वतंत्रता संग्राम के कई रत्नों जैसा है, जिन्हें सत्ता ने धुंधला कर दिया। किसी का भी मूल्यांकन समग्र और सर्वांग होना चाहिए। मिश्रजी का जो पक्ष ज़्यादा उजागर है वह कम से कम गौरवान्वित करने वाला तो नहीं है | हाँ, मुख्यमंत्री, मंत्री, कुलपति, प्रशासक, आयुक्त होना भर अगर गौरव से भरने के लिए काफ़ी है, तो अलग बात। किसी को भी वाजिब श्रेय देना ही श्रेयस्कर है। इन जैसे किरदारों से एक ठीकठाक कालांतर हो चुका है, तो उनको विश्लेषक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। जो त्याग-तपस्या की उसके लिए उन्हें पर्याप्त पद-प्रतिष्ठा मिली।
मिश्रजी अंतिम वर्षों में शहर के सीमांत में 'उत्तरायण’ में रहते थे। कोई भी गणमान्य या सत्ता-पुरुष नगर में आता तो उनके पास उसका जाना होता और यह मुलाक़ात अगले रोज़ अख़बार में छोटी सी ख़बर बनती कि फ़लां ने पंडितजी से राजनीतिक मंत्रणा की। दिल्ली में जब उनका निधन हुआ तो मैं एम्स गया। एक कमरे में स्ट्रेचर गाड़ी पर उनका शव रखा था। हैरानी की बात कि वहां कोई भी नहीं था, सिवाय श्याम बिलोहा के। 
मेरी उनसे एक मुलाक़ात है। इमरजेंसी हट गयी थी, चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। एक दिन ग्यारह बजे मैंं विश्वविद्यालय की तरफ से लौट रहा था कि साइंस कॉलेज के पास वृंदावन दुबे जी ने आवाज़ दी और कहा, दादा से मिलने चलो। वहां पहुँचे तो देखा मिश्र जी लॉन में टहल रहे हैं। दुबेजी ने तीन कोनों पर जाकर उनके चरण छुये पर उन्होंने आँख उठाकर नहीं देखा। फिर एक कुर्सी पर जब विराज गए तो उन्होंने फिर पैर पड़े, तब उन्होंने कहा, कैसे हो वृंदावन। दुबेजी ने जब मेरा परिचय कराया तो फिर वे मुझसे से बात करते रहे। पिताजी का स्वास्थ्य, हालचाल, आगे की योजना आदि की बातें पूछींं... मैंने उनसे पूछा कि कांग्रेस का यहाँ क्या होगा, तो तपाक से बोले, कांग्रेस हारेगी, फिर कुछ ठहरकर कहा, अगर भवानी तिवारी कांग्रेस से लड़ें तो टक्कर हो सकती है। ...पापाजी (तिवारीजी) के पास रोज़ ही जाना होता था, शाम को उन्हें बताया कि मिश्रजी ऐसा कह रहे थे, तो उन्होंने तम्बाकू फाँक कर, हाथ झाड़ते हुए कहा कि राज्यसभा हो आए, अब चुनाव में कौन पड़े।

 

    

एदुआर्दो गालेआनो

  • मनोहर नायक


एदुआर्दो गालेआनो उरुग्वे के पत्रकार, लेखक इतिहासकार 
थे। वे एक ऐसे प्रतिबद्ध, गम्भीर और संवेदनशील लेखक थे जिनकी नज़रों से कुछ भी ओझल न था- समाज, राजनीति, इतिहास के अंधेरों की वे शिनाख़्त करते हुए उनके रिसते जख़्मों को बताते हैं, उनकी बातों, विचारों में बहुत कुछ ऐसा है जो ऐसा लगता है कि जैसे यह हमारी स्थितियों का ही बखान है ... अरुंधति राय तो कहतीं हैं कि उनका नाम भारत के हर घर में जान-पहचाना नाम होना चाहिये। दुनिया भर के शोषितों- उत्पीड़ितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता लेखक जॉन बर्जर के इन शब्दों में व्यक्त होती है , ' एदुआर्दो को छापना एक दुश्मन को... झूठों के दुश्मन, उपेक्षा के और सबसे ज़्यादा  विस्मरण के दुश्मन को छापना है।  उनकी कोमलता विध्वंसकारी थी... और सच्चाई आवेशित और प्रचंड। ' उनकी सबसे बड़ी चिंता यही रही कि हम सब कुछ भूलते जा रहे हैं ।

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वह 14 अप्रैल 2015 का दिन था, रोज़ की तरह  मैं अपने मित्र, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में स्पोर्ट्स के ग्रुप एडीटर आलोक सिन्हा के साथ आईटीओ में इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग  के लिये निकला | आलोक फ़ुटबॉल  के फ़ैन और चेल्सी उनका पसंदीदा क्लब है | रास्ते में बातचीत शुरू करते हुये मैंने कहा कि एदुगार्दो गालेआनो के निधन  ( 13 अप्रैल) की ख़बर  हिंदी-अंग्रेज़ी में तो और कहीं है नहीं, आपके यहाँ अच्छी है पर खेल पन्ने पर है | उन्होंने कहा कि  उनकी फ़ुटबॉल पर अद्भुत पुस्तक है, मैंने कहा कि पर उनकी और भी चर्चित पुस्तकें हैं जिनमें एक को तो क्लासिक का दर्ज़ा हासिल है,...  उन्हें कम से कम  विदेश पेज पर वैसा ही स्पेस देना चाहिए था जैसा ग्रास ( जर्मन कवि, उपन्यासकार ग्यूंटर ग्रास का निधन भी उसी दिन हुआ था) को दिया गया , आलोक सहमत हुए |अगले दिन फिर इसी पर चर्चा हुई क्योंकि उस दिन टाइम्स समूह के ही इकॉनामिक्स टाइम्स ने एदुगार्दो पर टिप्पणी छापी , वही खेल पन्ने पर....  शायद तीसरे या चौथे दिन कवि, लेखक असद ज़ैदी  उन्हें तब अख़बारों की मुख्यभूमि में लाये जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादकीय पृष्ठ पर गालेआनो का समग्र, सारगर्भित मूल्यांकन पेश किया | एदुगार्दो की पहली पुस्तक जो हस्तगत हुई, वह ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका ' थी, इसे असद ज़ैदी के three essays collective ने प्रकाशित किया था... पर उरुग्वे के इन महामना से शायद 2009 में किंचित परिचित तब हुआ जब ' इंडिया टुडे ' के हमारे मित्र मोहम्मद वक़ास ने नेट पर उनकी किसी किताब पर आधारित स्टोरी 'आज समाज ' के लिये भेजी थी, जहां में तब काम करता था | 2010 के विश्व कप में 'आज समाज ' में ही  फ़ुटबॉल पर  उनकी किताब   के नेट पर उपलब्ध हिस्सों से एक पेज बनाया--- गोल, गोलकीपर, रेफ़री, मैनेजर, पेले आदि | मैं अनुवाद करके पास ही बैठे कार्टूनिस्ट मित्र मंसूर नक़वी को देता जाता और मंसूर इन पर बेहतरीन रेखांकन बनाते जाते | फिर बाद में 'ओपेन वेन्स...' मिली | प्रेस क्लब में एक दिन अचानक मित्र आलम श्रीनिवासन  दोस्ताने में ' मिरर्स ' दे गये | कुछ महीनों बाद यह यहाँ से वहाँ हो गयी जहाँ से फिर कोई ख़बर नहीं आती , बाद में यह मुश्किल से और महंगी मिली |अब तो उनकी अनेक पुस्तकें ठीकठाक दाम पर अमेज़न आदि पर सुलभ हैं | अच्छी बात यह है कि अब उनकी पुस्तकें हिंदी में भी अनुदित हो रहीं हैं... गार्गी प्रकाशन ने रेयाज़ुल हक़ के सम्पादन में उनकी चुनी हुई रचनाओं के अंशों को लेकर ' आग की यादें ' पुस्तक निकाली है, जो उन्हें जानने में काफ़ी मददगार है | गार्गी ने ही ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका ' का अनुवाद ' लातिन अमरीका के रिसते जख़्म ' के नाम से किया है... दिनेश पोसवाल  का अनुवाद सहज और बढ़िया है | यह एदुआर्दो की कालजयी कृति है... इस पर लौट कर आते हैं, पहले थोड़ा फ़ुटबॉल...! 

खेलों के बेतरह शौक़ीन और टेनिस व फ़ुटबॉल पर लट्टू मेरे बेटे आनंद ने कुछ साल पहले जन्म दिन पर भेंट दी थी, ' सॉकर इन सन एंड शैडो '... वही मशहूर किताब जिसके कारण गालेआनो दो राष्ट्रीय अख़बारों में खेल के पन्नों में महदूद होकर रह गये थे | अपने देश के और बच्चों की तरह एदुआर्दो भी फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनना चाहते  थे... खिलाड़ी न बन पाये पर उसके जुनून की गिरफ़्त  में ताउम्र रहे | पुस्तक के 'आत्म स्वीकृति ' अध्याय में वे लिखते हैं, ' ... सालों बीत गये और अंतत: अपने को स्वीकार करना मैंने सीख लिया, कि मैं कौन हूँ : अच्छी फ़ुटबॉल का एक भिखारी | मैं दुनिया भर में, स्टेडियमों में हाथ फैलाये जाता हूँ और कहता हूँ : ' भगवान के लिये एक सुंदर मूव  |' और जब बढ़िया फ़ुटबॉल होती है तो मैं धन्यवाद देता हूँ और मैं इसकी ख़ाक परवाह नहीं करता कि कौन सी टीम या देश यह कारनामा कर रहा है | ' एदुआर्दो के इस मिज़ाज से प्रेरित होकर फ़ुटबॉल देखने का तनाव काफ़ी कम हुआ |  

'स्टेडियम' अध्याय में वे लिखते हैं, ' क्या आप कभी ख़ाली स्टेडियम में गये हैं | कोशिश कीजिये ... मैदान के बीचोंबीच खड़े होइये और सुनिये | एक ख़ाली स्टेडियम से ख़ाली  और कोई कुछ नहीं होता | दर्शक विहीन स्टेडियम से ज़्यादा नि:शब्द भी और कुछ नहीं होता |... वेम्बले में, 1966 के वर्ल्ड कप का शोर, जिसे इंग्लैंड ने जीता था, आज भी सुनायी  देता है | और अगर ध्यान से सुनें तो 1953 की कराहें  भी सुनाई देंगी जब हंगेरियनों ने इंग्लैंड को हराया  था | मोंतेविदेओ का सेंतेनेरियो स्टेडियम अतीत राग में डूबा हुआ उरुग्वे फ़ुटबॉल के वैभव के दिनों की आहें भरता रहता है | ब्राज़ील  की 1950 में  हुई हार के लिए माराकाना आज भी रुआंसा है | ब्यूनस आयर्स  से बॉमबोनेरा में आधी सदी पहले के ड्रम आज भी गूंजते हैं | मिलान में गियूसेप्पे मिआज्जा का प्रेत गोल मारता रहता है, जिससे उसके नाम वाला स्टेडियम हिल उठता है | म्युनिख के ओलम्पिक स्टेडियम में 1974 का फ़ाइनल मैच, जो जर्मनी जीता, हर दिन, हर रात खेला जाता है | साउदी अरेबिया के किंग फ़हद स्टेडियम में बैठने के लिये संगमरमर और सोने के बॉक्स हैं और स्टैंड में भी कालीन चढ़ा हुआ है, लेकिन उसके पास कोई स्मृति नहीं है, और न बताने के लिये कुछ |' ' फ़ैन ' अध्याय में लिखते हैं , ' सप्ताह में एक बार फ़ैन घर से भागकर स्टेडियम पहुँच जाता है | हल्ला मचाने वालों के शोर से हवा भरी रहती है, ड्रम्स, पटाखे और बैनर | शहर ओझल हो जाता है, दिनचर्या भुला दी जाती है| मंदिर बच रहता है | फ़ैन चाहे तो यह सब टीवी पर देख ले, पर वह इस पवित्र जगह की तीर्थयात्रा करना पसंद करता है, जहाँ वह अपने देवताओ को उस दिन के राक्षसों के साथ साक्षात् युद्ध करता देख सकता है| यहाँ फ़ैन अपना रूमाल हिलाता है, अपना थूक गुटकता है, पित्त भड़काता है, प्रार्थनाएँ बुदबुदाता है और कोसता है, और अचानक पूरे ज़ोर  से चिल्लाता है , गोल होने के आह्लाद में वह पिस्सू की तरह लपकते हुए बगल के अनजान व्यक्ति के गले लग जाता है |  फ़ुटबॉल का फ़ैन निश्चित तौर पर जानता है कि हम सबसे अच्छे हैं, रेफ़री धूर्त है और प्रतिद्वंद्वी बेईमान | शायद ही कोई फ़ैन कहे कि, ' आज मेरा क्लब खेलेगा |' वह कहता है  , 'आज हम खेलेंगे | '  मैच ख़त्म हो जाता है, फ़ैन जो स्टैंड से अभी हटा नहीं है, अपनी जीत का जश्न मनाते हुए कहता है, ' हमने क्या सुंदर गोल किया |' ... गालेआनो   की नज़रों से कुछ ओझल नहीं होता | 1930 के विश्व कप का जायज़ा लेते हुए वे लिखते हैं, ' मर्लिन डाइटरिच "फ़ालिंग इन लव अगेन " गा रही थीं, मायकोव्स्की इस समय आत्महत्या कर रहे थे, वहीं अंग्रेज़ गांधी को जेल में डाल रहे थे, क्योंकि वे अपने प्यारे देश के लिये आज़ादी  मांग  रहे थे |' 'मैनेजरों ' के अध्याय में लिखते हैं, ' मैनेजर फ़ुटबॉल को विज्ञान और मैदान को प्रयोगशाला मानते हैं , लेकिन इन मालिकों के लिये आइंस्टीन की मेधा  और फ्रायड की सूक्ष्मदर्शिता  काफ़ी नहीं| उन्हें तो गांधी जैसी सामर्थ्य के साथ " लेडी ऑफ़ लॉर्ड्स " जैसी चमत्कारी शक्ति भी चाहिए |'


गालेआनो
का जन्म  उरुग्वे की राजधानी मोंतेविदेओ  में 3 सितम्बर 1940 को हुआ था | वे क्यूबा की क्रांति से प्रभावित 1960 की ' बूम जनरेशन ' की उपज थे | वे कोई प्रशिक्षित  इतिहासकार नहीं थे, वे ख़ुद को ' पत्रकारिता की औलाद' कहते  थे | एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, '  पत्रकारिता को साहित्य का स्याह पक्ष  मानने की एक परम्परा है, मैं इसे नहीं मानता | मैंने कई किताबें लिखीं हैं, पर मैं पत्रकार के रूप में ही प्रशिक्षित  हुआ | मैं पत्रकारिता का आभारी हूँ कि उसने दुनिया की  सच्चाई के प्रति मुझे जगा दिया | '  1960  में पत्रकारिता की  शुरुआत में   'मार्चा ' पत्रिका और फिर दैनिक 'एपोका ' का सम्पादन किया | इस दौरान चार साल के शोध के बाद लातिन अमरीका के  इतिहास पर 1970  में उन्होंने पुस्तक लिखनी शुरू की , जो आगे चलकर  प्रमाणिक दस्तावेजी पुस्तक मानी गयी | यह किताब थी  ' लास वेनास आबिएर्तास दे अमेरिका  लातीना '  अंग्रेज़ी में यह कहलायी ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका | ' 1973 में   उरुग्वे में तख्ता पलट के बाद इस पर पाबंदी लगा दी गयी | चिली. ब्राजील  और अर्जेटीना ने भी इस पर प्रतिबंध लगाया |  यह पुस्तक लातिन अमरीका  के शोषण- उत्पीड़न, संसाधनों की खोखला कर देने वाली लूट  , बर्बर दमन, अत्याचार और तानाशाहियों की  दारुण व  रोमांचक दास्तान है | इसको लेकर अनेक क़िस्से मशहूर हैं | एक इंटरव्यू में एदुआर्दो ने अत्यंत  दिलचस्प और विनोदी भाव से इस पुस्तक के लिखने को लेकर बातें की थीं, ' इस किताब का असली लेखक कॉफ़ी है| मैंने समुद्र के बराबर कॉफ़ी पी, क्योंकि तब 1970 में सुबह के समय मैं मोंतेविदेओ के  विश्विद्यालय में काम करता था | मैं विश्विद्यालय प्रकाशनों का सम्पादक  था | दोपहर में बतौर सम्पादक मैं एक निजी प्रकाशक के यहाँ काम करता था जहाँ मुझे हर तरह की किताबों  को फिर से लिखना और सुधारना पड़ता था | आप जितनी तरह की किताबों की कल्पना कर सकते हैं, उतनी तरह की किताबें, जैसे कि मच्छरों का यौन जीवन | तब शाम के सात या आठ बजे से लेकर सुबह के पांच या छह बजे तक में ओपेन वेन्स लिखता था | ' 

तख्ता पलट के बाद एदुआर्दो को देश छोड़ना पड़ा | वे अर्जैटीना गये वहाँ अपनी मशहूर पत्रिका ' क्रिसिस ' (संकट)  शुरू की  |1976  में अर्जेटीना में तख्ता पलट के कारण उन्हें वह देश छोड़ना पड़ा क्योंकि  उनका नाम उन लोगों की सरकारी फ़ेहरिस्त में था, जिन्हें हत्यारे दस्ते द्वारा मार दिया जाना था  | उनका यह निर्वासित और फ़रारी  जीवन  एक दशक चला | गालेआनो स्पेन में रहे, जहाँ उन्होंने तीन खंडों में  लातिन अमरीका का वैकल्पिक इतिहास लिखा,  'मेमोरी देल फ़ुएगो ' (आग की यादें) ... अंग्रेज़ी में यह  तीन खंडों में ' मेमोरी ऑफ़ फ़ायर ' नाम से छपी और बेहद मक़बूल हुई| 1985 में  वे देश लौटे | उनकी अन्य प्रमुख किताबें हैं ' डेज एंड नाइट्स ऑफ़ लव एंड वार ' , ' अब बुक ऑफ़ एम्ब्रसेज ' , 'अपने साइड डाउन : अप्रीमियम फ़ॉर द लुकिंग ग्लोबल वर्ल्ड ' , ' वॉयेजर ऑफ़ टाइम ' , 'मिरर्स '  आदि | उनकी कविता और कथा की पुस्तकें भी हैं | गालेआनो  विश्व नागरिक हैं |  वे हर तरह के पीड़ितों, वंचितों के प्रवक्ता हैं, ख़ास तौर पर बच्चों व महिलाओं के...सचाई और हक़ के तरफ़दार हैं, हर तरह के झूठ, फ़रेब, पाखंड  के वे शत्रु हैं, लूट की संस्कृति, मुनाफाखोरी और समाज व मानवीय, संबंधों को पतित करती शक्तियों से उन्हें नफ़रत है | उनके लेखन में इसलिये ग़ुस्सा. आवेश और तीक्ष्णता है, लेकिन उनकी शैली मोहक   और विचारोत्तेजक है... वह आपको अंतरंग बनाती चलती है |अपनी इस शैली का आविष्कार उन्होंने ही किया है, जिसके गद्य में कविता की लय और  लालित्य  है | अपने उसी इंटरव्यू में वे कहते हैं, ' मैंने इतिहास को फिर से ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश की जिसे कोई भी समझ सके |'

अब उनके कुछ विचार, कुछ बातें जो हमें सोच-विचार का स्फुरण देतीं हैं|   ध्यान देने योग्य यह है कि गालेआनो ने मुख्यतः ये  बातें लातिन अमरीका के देशों, समाजों, तानाशाहियों के बारे   में लिखीं हैं, लेकिन वे  हमारे  जीवन के आसपास की स्थितियां लगती हैं | कल, तीन सितम्बर को उनका जन्मदिन था  , उनके अनमोल योगदान  को याद करते हुए उनकी  विरासत में  से कुछ बातें | एदुआर्दो की चुनिंदा अंशों की किताब 'आग की यादें ' में ऐसे अनेकानेक अध्याय हैं , उनका क्रम भंग करते हुए उनमें से कुछ :

'मेहनत के बंटवारे की शुरुआत ' : कहते हैं कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत की जातियों को दैवीय बनाया | उसके मुंह से पुरोहित पैदा हुए, उसकी बांहों से राजा और योद्धा | उसकी जांघों से व्यापारी | उसके पैरों से ग़ुलाम और कारीगर |

और इस बुनियाद पर एक सामाजिक पिरामिड खड़ा हुआ, भारत में जिस पर तीन हज़ार से ज़्यादा कहानियों हैं|

हरेक वहीँ पैदा हुआ जहाँ उसे पैदा होना चाहिए| वही करने के लिए, जो उसे करना चाहिए | पालने में ही क़ब्र है और पैदाइश ही मंज़िल है-- हमारी ज़िंदगियां हमारी पहले की ज़िंदगियों का मुआवज़ा है या वाजिब सज़ा... | 

व्यवस्था : ... कि वह कम्प्यूटर प्रोग्राम जो बैंकर को सतर्क करता है, बैंकर जो राजदूत को सचेत करता है, राजदूत जो फ़ौज़ी जनरल के साथ खाना खाता है, फ़ौज़ी जनरल जो  राष्ट्रपति को मिलने के लिये बुलाता है, राष्ट्रपति जो मंत्री पर रोब दिखाता है, मंत्री जो महानिदेशक को धमकी देता है, महानिदेशक जो प्रबंधक को ज़लील करता है, प्रबंधक जो अफ़सर पर चीखता है, अफ़सर जो कर्मचारियों की तौहीन करते हैं, कर्मचारी जो मजदूरों को फटकारते हैं, मजदूर जो बीबियों से बदसलूकी करते हैं, बीबियाँ जो बच्चे को पीटती हैं, बच्चे जो कुत्तों को लात मारते हैं | 

सवाल यह है कि  हम जैसे लोग जो बेआवाज़ लोगों की आवाज़ बनना चाहते हैं वे इस भयानक माहौल में कैसे काम करें  ? जब डंडे और बाज़ार के ज़ोर से सबको गूंगा- बहरा  बनाया जा रहा है तब क्या हम अपनी बात सुना सकते हैं? आज के हमारे लोकतंत्र  दरअसल चुप्पी और डर पैदा करने वाले लोकतंत्र हैं |, .. हम जैसे समाजों में रह रहे हैं वहां आबादी के बड़े हिस्से की रचनात्मक क्षमताओं और सम्भावनाओं को लगतार ख़त्म किया जा रहा है | ... गरीबों को अमीरी, ग़ुलामों को आज़ादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गयी हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं |  ग़ैर बराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाये रखने की ज़रूरत का अहसास टीवी, रेडियो और फ़िल्में कराती हैं जो दिन-रात सबके समझ में आ सकने वाले अंदाज में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं | हमें सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही है  और सब कुछ ठीक चल रहा है | शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज़ उठाने वाले को बड़ी आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दिया जाता है | 'जंगल के कानून ' को ' कानून का राज ' घोषित कर दिया जाता है |

पैसे की बर्बादी, भद्दा प्रदर्शन और अच्छे- बचने का ख़याल न करते हुए सिर्फ़ आपका मतलब  निकालना अब कोई बुरी बात नहीं समझी जाती बल्कि कामयाब इनसान की पहचान मानी जाती है | यहाँ सब कुछ खरीदा, बेचा, किराये पर लिया और खाया-पचाया जा सकता है, यहाँ तक कि आत्मा भी | आजकल सिगरेट, गाड़ी, शराब की बोतल या घड़ी इन्सान को कुछ और होने  तथा किसी और दुनिया में ही होने का जादुई अहसास देती है | विदेशी नायकों की भरमार, धनी देशों से आये ब्रॉण्डों और फ़ैशन के लिए हमारी सनक का ही नतीजा है| टीवी और सिनेमा के पर्दै देशों की सामाजिक  समस्याओं और ज़मीनी राजनीतिक हालातों से कोसों दूर बनावटी और अश्लीलता की एक अलग दुनिया रचते हैं | पश्चिमी देशों से लाये गये टीवी कार्यक्रम यूरोप और अमरीका छाप लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं और वह भी बन्दूक और फ़ास्ट फ़ूड की जयजयकार के साथ | 

.... साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम  बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ  के ख़िलाफ़ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाज़ारीकरण से शब्दों को बचाना है| क्योंकि आजकल 'आज़ादी' मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने ख़ुद को 'लोकतंत्र ' घोषित कर रखा है | अब ' प्यार' इनसान का अपनी गाड़ी से लगाव है, और 'क्रांति' बाज़ार में आये किसी नये ब्रॉण्डों के धमाकेदार प्रचार के काम आ रही है |अब हमें ख़ास और क़ीमती ब्रॉण्डों का साबुन रगड़ने में ' गर्व ' और फ़ास्ट-फ़ूड  खाने पर ' ख़ुशी' का अहसास होता है| ' शान्त देश ' दरअसल  बेनाम क़ब्रों की लगातार बढ़ती जाने वाली क़तार है और ' स्वस्थ'  इनसान वह है जो सब कुछ देखता और चुप रहता है |

विद्यार्थी :  दिन- प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है| इस अधिकार की हंसी उड़ाते  सच अपनी सीखें हम तक रोज़ाना पहुँचाते हैं| हमारी दुनिया  धनी बच्चों को यूँ देखती है मानो वे  कोई चलती-फिरती तिजोरी हों | और फिर होता यह है कि ये बच्चे  असल ज़िंदगी में भी ख़ुद को रुपया-पैसा ही  समझने लगते हैं|दूसरी ओर, यही दुनिया ग़रीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज़ बना डालती है और मध्य वर्ग के बच्चे, जो न अमीर हैं न ग़रीब , यहाँ टीवी से यूँ बांध दिये गये हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही इस क़ैदी जीवन के ग़ुलाम हो जाते हैं |फ़ास्ट-फ़ूड, तेज़ कारें, तेज़ ज़िन्दगी .... धनी अपने कुछ होने का अहसास बच्चे   आसामान निगलते, टीवी चैनल बदलते बड़ी- बड़ी खरीदारी करते हुए पाते हैं साइबर दुनिया में घूमते इन साइबर बच्चों का नाम अकेलापन  शहरों की गलियों में भटकते बेसहारा बच्चों की तरह ही होता है | धनी बच्चे जवान होकर  अकेलापन ख़त्म करने और तमाम डर भुलाने के लिये नशीली दवाएं ढूंढे, इसके बहुत पहले से ही ग़रीब बच्चे पेट्रोल और गोंद में छुपा नशा ले रहे होते हैं| वहीं, जब धनी बच्चे लेजर बन्दूकों  के साथ युद्ध का खेल लिए खेलते हैं  , गली के बच्चों को असली गोलियां निशाना बना रही होती हैं | . .. हक़ीक़त फ़िल्मों की नकल करती है :  हर चीज़ उड़ रही हैं |

बच्चे मैकडोनॉल्ड के हैपी मील  में अटलांटिस से मिसाइल हासिल करमते हैं| कैचअप और ख़ुन में फ़र्क़ करना मुश्किल से मुश्किलें होता जा रहा है |

इस दुनिया में नाइंसाफी बड़े पैमाने पर है | कुछ सौ के पास  पूरी मानवता की कुल आमदनी का आधा है | यह रोटियों और मछलियों का नाइंसाफ़ी भरा बंटवारा है | दुनिया एक हिंसक जगह है और अगर एक ग़रीब आदमी कुछ चुरा लेता है  या अपहरण करता है या मार देता है तो इसकी निंदा करना बहुत आसान है | लेकिन इसकी जड़ों की तलाश करना और उस व्यवस्था की निंदा करना इतना आसान नहीं है जो अपराधों और नशीली दवाओं के इस्तेमाल की वजह है | हरेक दिन हरेक आदमी बहुत सारा आक्रोश और ग़ुस्सा पी रहा है |

अदालतें : लेखक डेनियल ड्रीम कहते हैं कि क़ानून मकड़ी का एक ऐसा जाल है, जिसे मक्खियों और छोटे कीड़ों को पकड़ने के लिये बुना गया है, न कि बड़ी प्रजातियों का रास्ता रोकने के लिए | एक सदी पहले, कवि खोसेर एरनदिस ने क़ानून की तुलना एक छुरे से की थी, जो कभी उसकी ओर नहीं मुड़ता, जिसने उसे पकड़ रखा हो |

व्यवस्था : हर महीने एक नयी जेल का उद्घाटन होता है| यह वह चीज़ है, जिसे अर्थशास्त्री ' विकास योजना ' कहते हैं | 


लेकिन
नहीं दिखने वाली जेलों का क्या? कौन सी आधिकारिक रिपोर्ट या विपक्ष की आलोचनाएँ उन लोगों की फ़ेहरिस्त पेश करती है,  जिन्हें ख़ौफ़ ने क़ैदबंद कर रखा है | अपनी नौकरी गंवाने का ख़ौफ़, कम नहीं मिलने का ख़ौफ़, बोलने का ख़ौफ़, सुनने का ख़ौफ़, पढ़ने का ख़ौफ़ | ख़ामोशी के मुल्क़ में, आपकी आंखों की रोशनी आपको एक यातना शिविर में फेंक सकती है | किसी कर्मचारी को जलाना ज़रूरी नहीं है, उसे यह बता देना ही काफ़ी है कि उसे फ़ौरन बरख़ास्त कर दिया जायेगा और आगे उसे कोई काम नहीं देगा | सेंसरशिप की सचमुच तब जीत होती है जब  हरेक नागरिक  अपनी हरकतों और बातों के लिए  ख़ुद एक संगदिल सेंसर में तब्दील हो जाये | 

तानाशाही बैरकों और पुलिस थानों, छोड़े हुए रेल के डिब्बों और बेकार पड़ी नावों  को जेल में बदल देती हैं | क्या ये हरेक इनसान के घर को भी जेल में नहीं बदल देतीं  ?

हमारा कारगर होना हमारी निर्भीकता, चतुराई, स्पष्टता और दूसरों को अपनी ओर खींचने की क्षमता पर निर्भर करता है | मुझे उम्मीद है कि हम एक ऐसी भाषा का सृजन कर सकते हैं, जो गोधूलि का स्वागत करने वाली परम्परावादी लेखकों की भाषा से कहीं अधिक निर्भय और सुंदर होगी |

    

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद और जबलपुर

 



        

हॉकी के जादूगर के नाम से विश्व विख्यात ध्यानचंद का 115 वां जन्मदि‍वस आज शन‍िवार 29 अगस्त को है। ध्यानचंद के जन्मद‍िवस को सारा देश ‘खेल द‍िवस’ के रूप में मना रहा है। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के शानदार करतबों के बारे में सालों से बहुत कुछ ल‍िखा जाता रहा है, क‍िन्तु यहां उनके 115 वें जन्मद‍िवस पर वीरांगना रानी दुर्गावती के नगर जबलपुर से उनके घन‍िष्ठ संबंधों की चर्चा है। जबलपुर हॉकी का इतिहास न केवल बहुत पुराना है, वरन् यहां का हॉकी का स्तर देश के श्रेष्ठतम हॉकी स्तर में गिना जाता रहा है। ध्यानचंद झांसी के थे, परन्तु उनका जबलपुर से भावनात्मक संबंध भी रहा।

  ध्यानचंद के पिता रामेश्वर सिंह पहली ब्राम्हण रेजीमेंट में सूबेदार थे। यह रेजीमेंट उन दिनों इलाहाबाद में तैनात थी। बाद में यह रेजीमेंट जबलपुर में स्थानांतर‍ित की गई। रेजीमेंट के साथ रामेश्वर सिंह जबलपुर आ गए। ध्यानचंद जब सिर्फ चार वर्ष के बच्चे थे, तब वे पहली बार अपने पिता के बड़े भाई के पास जबलपुर आए थे। रूप स‍िंह का जन्म 1908 में जबलपुर में ही हुआ। इसके बाद दोनों भाईयों जबलपुर आना लगा रहा। बाद के दिनों में रूप स‍िंह भी, ध्यानचंद की तरह विश्व विख्यात हुए। ध्यानचंद के अंतर्राष्ट्रीय हॉकी के प्रारंभ‍िक साथ‍ियों में जबलपुर के रेक्स नॉर‍िस और माइकल रॉक थे। उपर्युक्त दोनों ख‍िलाड़‍ियों ने एम्सटर्डम (हॉलैंड) में सन् 1928 में ओलंपिक हॉकी टीम के साथ यात्रा की थी और यह टीम ओलंपिक विजेता बनी। ध्यानचंद 1922 में सेना में सिपाही  के रूप में भर्ती हुए। 1927 में भारतीय आर्मी टीम के न्यूजीलैंड दौरे की सफलता के बाद ध्यानचंद को लांस नायक पद पर पदोन्नत‍ि दी गई। कुछ वर्षों बाद ध्यानचंद की पहली ब्राम्हण बटालियन तोड़ दी गई, तो वे दूसरी बटालियन पंजाब रेजीमेंट चले गए।  ध्यानचंद की यहां रघुनाथ शर्मा से मित्रता हुई। रघुनाथ शर्मा की जबलपुर के तुलाराम चौक पर स्थि‍त रघुनाथ शस्त्रालय नाम की दुकान वर्षों तक काफी प्रस‍िद्ध रही। ध्यानचंद और रघुनाथ शर्मा अपनी रेजीमेंट के साथ पाक‍िस्तान के बन्नू कोहट में भी रहे। ध्यानचंद और रघुनाथ शर्मा लंगोट‍िया दोस्त थे। यहां तक की विवाह के लिए ध्यानचंद की पत्नी का चयन रघुनाथ शर्मा की सलाह से हुआ और बाद में विवाह हुआ। जबलपुर के सेवानिवृत्त रेलवे सुपर‍िटेडेंट एम. लाल (र‍िछार‍िया) भी झांसी से ही ध्यानचंद के अच्छे साथ‍ियों में थे।  

जबलपुर के खेल क्षेत्र के बहुत से अध‍िकारी भी खेलकूद के कारण ध्यानचंद को भली-भांति जानते थे। जबलपुर से ध्यानचंद का सबसे गहरा संबंध उस समय स्थापित हुआ, जब उनकी बहिन सुरजा देवी का सन् 1940 में राइट टाउन निवासी क‍िशोर स‍िंह चौहान से विवाह संपन्न हुआ। चौहान परिवार हवाघर नाम से प्रख्यात मकान में रहता था। जब से दोनों ओलंपिक ख‍िलाड़ी ध्यानचंद व रूप स‍िंह प्राय: जबलपुर आते रहते थे। उनकी बहिन श्रीमती सुरजा देवी के पुत्र विक्रम सिंह चौहान वर्तमान में हवाघर के नजदीक रहते हैं। 

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का जबलपुर के खेल ‘भीष्म पितामह’ माने जाने वाले बाबूलाल पाराशर से भी लम्बे समय तक संबंध व सम्पर्क रहा। बाबूलाल पाराशर और ध्यानचंद परस्पर एक दूसरे के विरूद्ध हॉकी मैच खेल चुके थे। इसी प्रकार ध्यानचंद की आत्मक‍था ‘गोल’ को लिखने वाले पंकज गुप्ता की बाबूलाल पाराशर ने काफी मदद की। इस आलेख को लिखने में बाबूलाल पाराशर के संस्मरणों की सहायता ली गई। उन्हीं के एक संस्मरण के अनुसार ध्यानचंद की एक पुरानी यात्रा 16 मार्च 1953 को हुई थी। ध्यानचंद उस समय नागपुर से राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम को प्रश‍िक्षण दे कर वापस लौट रहे थे।  यह टीम बाद में अख‍िल भारतीय महिला हॉकी एसोस‍िएशन के तत्वावधान में इंग्लैंड के दौरे पर गई। संयोग से उस टीम में चार ख‍िलाड़ी जबलपुर की थीं। उस समय जबलपुर जिला हॉकी एसोस‍िएशन के तत्वावधान में नागरिकों पुलिस मैदान में तत्कालीन महापौर भवानीप्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में ध्यानचंद का नागर‍िक सम्मान क‍िया गया था। उस दिन ध्यानचंद को एक जीप में बैठा कर पुलिस ग्राउंड के चारों ओर सड़कों पर घुमाया गया और करतल ध्वनि से उनका स्वागत क‍िया गया। जनसमूह के आग्रह पर उन्होंने हॉकी का प्रदर्शन क‍िया। इस समारोह में ध्यानचंद के साथी माइकल रॉक भी उपस्थि‍त थे। 

वर्ष 1964 की यात्रा के दौरान ध्यानचंद

        ध्यानचंद की अगली जबलपुर यात्रा मध्यप्रदेश क्रीड़ा परिषद के आमंत्रण पर 1964 में हुई। इस वर्ष शहर में हॉकी का प्रश‍िक्षण श‍िविर आयोजित क‍िया गया। उस समय ध्यानचंद राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान पट‍ियाला में हॉकी के प्रश‍िक्षक थे। जबलपुर में प्रश‍िक्षण श‍िविर के दौरान ध्यानचंद की सहायता के लिए भोपाल के प्रश‍िक्षक लाल मोहम्मद भी आए थे। दोनों को शासकीय श‍िक्षा महाविद्यालय (पीएसएम) के छात्रावास में ठहराया गया था। इस प्रश‍िक्षण श‍िविर का उद्घाटन 12 जून 1964 को कुंजीलाल दुबे ने किया। उस समय जबलपुर वास‍ियों ने इस हॉकी के जादूगर को प्रश‍िक्षक के रूप में देखा। स्थानीय क्लबों की ओर से उनके लिए अनेक सम्मान कार्यक्रम आयोजित क‍िए गए। कृष्ण कुमार भनोट ने 21 जून 1964 को भेड़ाघाट में ध्यानचंद के सम्मान में भोज का आयोजन क‍िया। 25 जून 1964 को परमानंद पटेल ने प्रश‍िक्षण श‍िविर का समापन क‍िया। 

इसके बाद उनकी यात्रा अपने पुत्र राजकुमार के विवाह के सिलसिले में हुई। राजकुमार का विवाह जबलपुर के तत्कालीन खाद्य अध‍िकारी जी. के. स‍िंह की पुत्री वीणा के साथ हुआ था। बारात ब्यौहार बाग स्कूल के छात्रावास में ठहराई गई। बारात में दोनों ख‍िलाड़ी बंधु ध्यानचंद व रूप सिंह सम्म‍िलित हुए। 

स्मार‍िका का व‍िमोचन करते हुए ध्यानचंद 

ध्यानचंद की अगली व अंतिम यात्रा 1975 में हुई। वे मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल के तत्कालीन अध्यक्ष डब्ल्यू. वी. ओक के आमंत्रण पर अख‍िल भारतीय विद्युत क्रीड़ा नियंत्रण मण्डल हॉकी प्रत‍ियोगिता का उद्घाटन करने विशेष रूप से झांसी से आए थे। इस प्रत‍ियोगिता का उद्घाटन 31 जनवरी 1975 को हुआ था। उस समय ध्यानचंद को पचपेढ़ी में विश्वविद्यालय के सामने स्थि‍त 'ब्लेग डान' अत‍िथ‍ि गृह में ठहराया गया था। रेलवे स्टेड‍ियम में पूरी प्रत‍ियोगिता खेली गई। उद्घाटन के मौके पर ध्यानचंद का शानदार स्वागत क‍िया गया। अगले द‍िन उन्हें स्थानीय हॉकी पदाध‍िकार‍ियों द्वारा दमोह ले जाया गया। जबलपुर में ध्यानचंद के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित क‍िए गए। 2 फरवरी 1975 को मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल में उनका व‍िदाई समारोह आयोज‍ित क‍िया गया। हॉकी के व‍िख्यात जादूगर को जबलपुरवास‍ियों ने अंत‍िम बार देखा।


   जबलपुर को ध्यानचंद को कभी हॉकी खेलते देखने का सौभाग्य नहीं म‍िला, लेक‍िन उनके पुत्र अशोक कुमार को राइट टाउन स्टेड‍ियम में 30 अप्रैल 1975 को ऑल इंड‍िया इलेवन की ओर से शेष भारत के व‍िरूद्ध खेलते देखने का अवसर जरूर म‍िला। अशोक कुमार क्वलालाम्पुर के तीसरे विश्व कप हॉकी की विजेता भारतीय टीम के सदस्य थे। आठवें दशक में जबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय जूनियर हॉकी प्रत‍ियोगिता ध्यानचंद के एक अन्य पुत्र देवेन्द्र स‍िंह उत्तरप्रदेश की ओर से खेलने आए। 

जबलपुरवासी ध्यानचंद को क‍ितना प्यार और सम्मान देते थे, इसकी बानगी 21 द‍िसंबर 1978 की एक घटना से म‍िलती है। इस द‍िन राष्ट्रीय महिला हॉकी प्रत‍ियोगिता के अंतर्गत गुजरात व तम‍िलनाडु के मध्य खेले गए मैच की मुख्य अत‍िथ‍ि श्रीमती सुरजा देवी थीं। जब उद्घोषक ने लाउड स्पीकर पर घोषि‍त क‍िया क‍ि ध्यानचंद की बह‍िन श्रीमती सुरजा देवी आज की मुख्य अत‍िथ‍ि हैं, तो स्टेड‍ियम में उपस्थि‍त जनसमूह खड़े हो कर यह देखने लगा क‍ि कहीं महत्वपूर्ण व्यक्त‍ियों की गैलरी में ध्यानचंद तो नहीं बैठे हैं ? खेलप्रेमी दर्शकों ने हॉकी के महान् ख‍िलाड़ी ध्यानचंद की बहिन का करतल ध्वन‍ि से स्वागत क‍िया।

    

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