रघुवीर यादव की न्यूटन फिल्म से जबलपुर आस्कर अवार्ड से जुड़ गया है। न्यूटन इस वर्ष आस्कर अवार्ड ...

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  1. रघुवीर यादव की न्यूटन से जबलपुर की आस आस्कर अवार्ड से जुड़ी
  2. जबलपुर की हॉकी और ओलंपिक का 88 वर्ष पुराना है रिश्ता
  3. डा. संदीप जैन कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित
  4. विवेचना रंगमंडल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह: विविधताओं से भरा हुआ रंग परसार्इ-2013
  5. पीवी राजगोपाल को अन्ना हजारे से अलग, स्वयं का अस्तित्व बनाए रखने की सलाह
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रघुवीर यादव की न्यूटन से जबलपुर की आस आस्कर अवार्ड से जुड़ी

रघुवीर यादव की न्यूटन फिल्म से जबलपुर आस्कर अवार्ड से जुड़ गया है। न्यूटन इस वर्ष आस्कर अवार्ड के लिए भारत की अध‍िकारिक प्रव‍िष्ट‍ि है। रघुवीर यादव की इस फ‍िल्म से भारत ही नहीं बल्क‍ि जबलपुर की आस भी आस्कर अवार्ड से जुड़ गई है। जबलपुर के मूल निवासी रघुवीर यादव प्रत्येक वर्ष दीपावली पर यहां करौंदी स्थि‍त घर में आते हैं, लेकिन इस वर्ष वे दीपावली में स‍िक्क‍िम में थे। मुंबई से उन्होंने बातचीत में कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस वर्ष न्यूटनआस्कर अवार्ड में भारत के लि‍ए उपलब्ध‍ि हासि‍ल करेगी और भारतीय फिल्म उद्योग के लिए नए अध्याय की शुरूआत होगी। रघुवीर यादव ने कहा कि अब कंटेंट बेस्ड सि‍नेमा ही पनपेगा। अमित मसुरकर निर्देशि‍त न्यूटन एक ब्लेक कॉमेडी फिल्म है, जो भारतीय चुनाव प्रणाली पर कड़क व्यंग्य कसती है। न्यूटनकी सफलता पर रघुवीर यादव ने कहा कि स्टारों की फिल्में असफल हो रही हैं। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि आप हर समय दर्शकों को बेवकूफ नहीं बना सकते। दर्शक अब बुद्धि‍मान है, वह अच्छी व बुरी फिल्म में अंतर करने लगा है।        
रघुवीर यादव एक फिल्म अभ‍िनेता, एक थ‍ि‍एटर आर्टिस्ट,एक गायक, एक संगीतकार और एक सेट डिजाइनर के रूप में हमारे सामने आते हैं और बहुमुखी प्रतिभा से समय-समय पर अवगत करवाते हैं। लगभग तीन दशक से अभ‍िनय कर रहे 60 वर्षीय रघुवीर यादव, एकमात्र बालीवुड अभ‍िनेता हैं, जिनकी आठ फिल्मों ने सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की केटेगरी में भारत का प्रत‍िध‍ित्व किया है। इन फिल्मों ने आस्कर में अलबत्ता कोई अवार्ड तो नहीं जीता, लेकिन दो फिल्में सलाम बॉम्बे (वर्ष 1988) एवं लगान ( वर्ष 2001) नामांकन में अंतिम पांच फिल्मों की दौड़ तक अवश्य पहुंची हैं।
रघुवीर यादव की न्यूटन इस वर्ष 26 फिल्मों (जिसमें बाहुबली-दो भी थी) को पीछे छोड़ कर आस्कर अवार्ड के चुनी गई है। इससे पहले रघुवीर यादव की सात फिल्मों-सलाम बॉम्बे (वर्ष 1988) रूदाली (वर्ष 1993), बेंडिट क्वीन (वर्ष 1994), 1947 अर्थ (वर्ष 1998), लगान (वर्ष 2001), वाटर (वर्ष 2005) और पीपली लाइव (वर्ष 2010) ने आस्कर अवार्ड में भारत का प्रत‍िन‍ित्व किया है।
पचास वर्ष पूर्व घर से भागने वाले रघुवीर यादव ने कभी भी अवार्ड को ध्यान में रख कर अभ‍िनय नहीं किया। वे प्रत्येक फिल्म में अपनी भूमिका पर एकाग्रचित हो कर काम करते हैं। रघुवीर यादव की आस्कर अवार्ड के लिए भेजी गई आठ फिल्मों में उनकी भूमिका कहीं छोटी तो कहीं बड़ी थी, लेकिन वे सलाम बॉम्बे में ड्रग एड‍िक्ट की चिलम और लगान की भूरा की भूमिका को याद करते हैं और उन्हें अविस्मरणीय मानते हैं। धूम्रपान न करने वाले रघुवीर यादव ने सलाम बॉम्बे ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाने के लिए कई ड्रग एडि‍क्टों का आर्ब्जवेशन किया और एक वर्कशाप में भाग लिया था। वैसे उन्हें भूमिका की मांग के अनुरूप कभी सिगरेट या बीड़ी पीना पड़े तो उन्हें धूम्रपान करना मुश्किल लगता है। 

     
 
    

जबलपुर की हॉकी और ओलंपिक का 88 वर्ष पुराना है रिश्ता


पश्चि‍म मध्य रेल जबलपुर की महिला हॉकी ख‍िलाड़ी सुनीता लाकड़ा को रियो ओलंपिक में भाग लेने वाली की भारत की महिला हॉकी टीम में शामिल करने से हॉकी जगत में खुशी की लहर फैल गई है। जबलपुर और ओलंपिक का रिश्ता फिर एक बार जुड़ने जा रहा है। जबलपुर देश का सबसे पुराना हॉकी का गढ़ रहा है। जबलपुर में हॉकी को परिचित करवाने का श्रेय ब्रिटिश ऑर्मी है। 19 वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ऑर्मी ने हॉकी से स्थानीय नागरिकों को परिचित करवाने के पश्चात् भारतीय व एंग्लो-इंडियन समाज ने हॉकी खेलने की शुरूआत की। ओल्ड राबर्टसन कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य सर हेनरी शार्प ने 1894 में हॉकी को व्यवस्थि‍त रूप दिया। सन् 1900 में दो क्लब बनाए गए। सिटी स्पोर्ट्स व केंटोमेंट स्पोर्ट्स हॉकी क्लब के पश्चात् 20 वीं श्ताब्दी की शुरूआत के पहले दशक में पुलिस विभाग ने हॉकी को अपनाया। उस समय जबलपुर में ऑर्मी की दो प्रसिद्ध बटॉलियन 33 पंजाबीस् व फर्स्ट ब्राम्हण का डेरा जबलपुर में था और इनका नेतृत्व मेजर फेल्ट एवं सूबेदार बाले तिवारी कर रहे थे। याद रहे कि बाले तिवारी हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के गुरू थे। ध्यानचंद के अनुज रूप सिंह का जन्म सन् 1909 में जबलपुर में ही हुआ था। उस समय नन्हें ध्यानचंद जबलपुर में पदस्थ अपने पिता जी के साथ फर्स्ट ब्राम्हण बटॉलियन की बैरक में रहते थे। 
जबलपुर की ब्रिटिश रेजीमेंट चेशायरने राष्ट्रीय हॉकी जगत में उस समय जबलपुर का नाम गौरवान्वि‍त किया, जब इस टीम ने बंबई में लगातार सन् 1910, 1911 व 1912 में आगा खां हाकी टूर्नामेंट जीता। उन्हीं की तरह जबलपुर के देशी क्लबों ने भी लखनऊ के प्रसिद्ध रामलाल हॉकी कप को सन् 1915 व 17 में जीता। तब तक जबलपुर के देशी हॉकी क्लब भोपाल के प्रसि‍द्ध ओबेदुल्ला एवं इंतीदार हॉकी टूर्नामेंट में अपना डंका बजा चुके थे। जबलपुर के सदर निवासी इब्राहिम व राबर्टसन कॉलेज के नुरूल लतीफ में हॉकी का ऐसा कौशल था कि वे सन् 1920 में ऑल इंडिया की किसी भी टीम में खेल सकते थे। एंग्लो इंडियन ख‍िलाड़‍ियों से सजी जीआईपी रेलवे भी इसी समय उभर कर सामने आई और इस टीम ने सन् 1921, 1922, 1925 एवं 1926 में आगा खां टूर्नामेंट के साथ सन् 1923 में ग्वालियर गोल्ड कप टूर्नामेंट  को पहली बार भाग लेते हुए जीता। उस समय जबलपुर के क्लब डीआईजी पुलिस, सिटी व केंटोंमेंट स्पोर्ट्स भारत के नामी व प्रथम श्रेणी के क्लबों में शामिल किए जाते थे। इस समय को जबलपुर की हॉकी का स्वर्ण‍िम युग कहा जा सकता है।
जेईएए ने सन् 1907 में स्कूलों में हॉकी की शुरूआत करवाई। स्कूलों में अंजुमन, सीएमएस, मॉडल, क्राइस्ट चर्च, सेंट अलॉश‍ियस, एपी नर्बदा हॉकी नर्सरी में रूप में पहचानी गई।
सन् 1928 हॉकी के लिए श‍िखर वर्ष के लिए जाना गया, जब रेक्स नॉरिस और मोरिस रॉक ने भारतीय हॉकी टीम का ओलंपिक में प्रतिनिधि‍त्व किया। इस भारतीय टीम में एम्सटर्डम में पहली बार हॉकी में ओलंपिक का स्वर्ण पदक जीता। इसके पश्चात् जबलपुर के कई हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने व‍िभ‍िन्न ओलंप‍िक खेलों में भागीदारी की। इनमें सुलवान सन् 1932, कॉनराय 1948 इंग्लैंड ओलंपिक, पीस ब्रदर्स 1960 ओलंपिक और आस्ट्रेलियन हॉकी कोच मर्व एड्म्स भी जबलपुरियन रहे हैं।
जबलपुर के नेमीचंद्र अग्रवाल, एस. एन. शुक्ला, एस. के. नायडू व बी. के. सेठ ने अंतरराष्ट्रीय अम्पायर्स के रूप में ख्याति अर्जित की। जबलपुर के चारों अम्पायर्स ने बैंकाक, तेहरान व 1980 के एशि‍यन गेम्स में अम्पायरिंग की।
जबलपुर में महिला हॉकी को उस समय गति व लो‍कप्रियता मिली, जब सन् 1936 में नागपुर में सीपी एन्ड बरार लेडि‍स हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। शुरूआत में महिला हॉकी में एंग्लो इंडियन व पारसी समाज की महिलाओं ने हॉकी में रूचि दिखाई और इन्हें इंटरनेशनल नॉरिस व रॉक ने प्रश‍िक्ष‍ित किया। सन् 1945 में जबलपुर का पहला महिला हॉकी क्लब जुबली क्लब बनाया गया और इसने जल्द प्रस‍िद्ध‍ि बिखेरना शुरू कर दी। जबलपुर की स्मि‍थ सिस्टर्स व नॉरिस सिस्टर्स ने नागपुर के क्लब से  खेलते हुए उस समय मध्यप्रदेश को नेश्नल चार बार विजेता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दो बहिनों की जोड़ी  को भारत की पहली महिला टीम में शामिल किया गया, जिसने 1953 में इंग्लैड का दौरा किया था। इसी टीम ने सन् 1956 में आस्ट्रेलिया का दौरा भी किया। सन् 1961 में जबलपुर विश्वविद्यालय में महिला हॉकी ख‍िलाड़‍ियों की संख्या को देख कर महाकौशल महिला हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। महाकौशल हॉकी एसोसिएशन की टीम ने सन् 1962 में अंतरविश्वविद्यालय टूर्नामेंट में पंजाब के साथ फाइनल मैच खेला।
जबलपुर की महिला हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस‍िद्ध‍ि पाई, उनमें चारू पंड‍ित, सरोज गुजराल, सिथ‍िंया फर्नांडीज, अविनाश सिद्धू (भारत की कप्तान रहीं), गीता राय, कमलेश नागरथ, आशा परांजपे, मंजीत सिद्धू और मधु यादव प्रमुख हैं। अविनाश सिद्धू ने भारतीय हॉकी टीम के कोच, मैनेजर, रैफरी की भूमिका भी निभाई। संभवत: वे भारत की एकमात्र महिला ख‍िलाड़ी रहीं हैं, जिन्होंने दो खेल हॉकी व वालीबाल में भारतीय टीम का प्रतिनिध‍ित्व किया। अविनाश सिद्धू बांग्लादेश शूट‍िंग टीम की खेल मनोवैज्ञानिक भी रहीं और उनके प्रयास से बांग्लादेश ने सैफ खेलों में मेडल जीतने में सफलता पाई।

                                                                                                 
                        


    

डा. संदीप जैन कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित

लाइन्स आफ विजडम
राजीव सभरवाल डा. जैन को पुरस्कृत करते हुए
बलपुर के सुप्रसिद्ध र्इएनटी चिकित्सक  डा. संदीप जैन को आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक http://www.cameraderie.co.in द्धारा आयोजित कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन-2013 में अम्योचर (शौकिया) श्रेणी में उनकी फोटो प्रविष्टि लाइन्स आफ विजडम के लिए जूरी च्वाइस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। पिछले दिनों मुंबर्इ में आयोजित एक भव्य समारोह में आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक की प्रबंध संचालक व सीर्इओ चंदा कोचर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर राजीव सभरवाल और के. रामकुमार ने डा. संदीप जैन को सिल्वर अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित किया। डा. संदीप जैन वेस्टर्न जोन में विजेता रहे और पुरस्कृत होने वाले छायाकारों में वे मध्यप्रदेश से एकमात्र छायाकार थे। डा. जैन की प्रविष्टि को जूरी ने 16 सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि में भी चयनित किया।

अवार्ड
कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में देश भर से 8700 छायाकारों ने भाग लिया था और इसमें कुल 11,000 से ज्यादा फोटो प्रविष्टियां प्राप्त हुर्इ थीं। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छायाकारों को अपनी प्रविष्टि आन-लाइन प्रेषित करनी थी। प्रतियोगिता के निर्णायक ओग्लिवी एंड मेथर (ओएंडएम) एडवरटाइजिंग एजेंसी साउथ एशिया के एक्जीक्यूटिव चेयरमेन व क्रिएटिव डायरेक्टर पीयूष पांडे, स्मार्ट फोटोग्राफी के टेक्नीकल एडीटर रोहिंटन मेहता, लोनली प्लेनट के संपादक वर्द्धन कोंडविकार, प्रसिद्ध फैशन फोटोग्राफर रफीक सैयद, प्रसिद्ध इंडस्ट्रियल फोटोग्राफर हरि महीधर और आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के. रामकुमार थे। प्रतियोगिता में निर्णायकों के निर्णय के अतिरिक्त आन-लाइन वोटिंग से प्रतियोगिता का समग्र परिणाम निकाला गया।



    

विवेचना रंगमंडल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह: विविधताओं से भरा हुआ रंग परसार्इ-2013



बलपुर की विवेचना रंगमंडल ने पिछले दिनों पांच दिवसीय रंग परसार्इ-2013 राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह का आयोजन स्थानीय प्रेक्षागृह शहीद स्मारक में किया। इस बार का नाट्‌य समारोह प्रसिद्ध साहित्यकार, शिक्षाविद, पत्रकार और पूर्व मेयर रामेश्वर प्रसाद गुरू को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुर्इ थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमंडल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुर्इ रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना प्रत्येक वर्ष नाट्‌य समारोह में नए निर्देशकों को मौका दे रही है। इस बार के नाट्‌य समारोह में भी नए नाट्‌य निर्देशक को मौका दिया गया। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। नाट्‌य समारेाह में मध्यप्रदेश नाट्‌य स्कूल के निदेशक संजय उपाध्याय को रंगकर्म में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए 21 हजार रूपए की राशि भेंट कर सम्मानित किया गया।

पांच दिवसीय नाट्‌य समारोह में निर्माण कला मंच पटना ने संजय उपाध्याय के निर्देशन में कंपनी उस्ताद, अलंकार थिएटर ग्रुप चंडीगढ़ ने चक्रेश कुमार के निर्देशन में थाट, आल्टरनेटिव लिंविंग थिएटर कोलकाता ने प्रोबीर गुहा के निर्देशन में विषादकाल, देवांचलतम रंगमंडल लखनऊ ने संगम बहुगुणा के निर्देशन में दामाद-एक खोज और मेजबान विवेचना रंगमंडल ने प्रगति-विवेक पाण्डेय के निर्देशन में मोहन राकेश लिखित आधे-अधूरे को प्रस्तुत किया।

नाट्‌य समारोह में मंचित किए गए सभी नाटक विविध विषयवस्तु और प्रस्तुतियों की दृष्टि से दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रहे। कंपनी उस्ताद संगीत और स्वतंत्रता संग्राम के अंतर्संबंधों के कारण, तो थाट वर्तमान के युवाओं व उनकी विचारधारा को ले कर दर्शकों को उद्वेलित कर गया। वहीं विषादकाल अपने फार्म के कारण और कलाकारों के अभिनय से जबलपुर के दर्शकों के दिल में गहरार्इ से उतरा। दामाद-एक खोज टिपीकल हास्य नाटक था, जो कि गंभीर प्रस्तुतियों के बीच रिलेक्स होने के लिए सफल रहा। मेजबान विवेचना रंगमंडल की प्रस्तुति आधे-अधूरे को नाटय समारोह की सबसे सफल प्रस्तुति के रूप में देखा गया। मोहन राकेश का यह नाटक लगभग पांच दशक बीत जाने के पश्चात भी अपनी विषयवस्तु के कारण सम-सामयिक है। आधे-अधूरे की प्रस्तुति में कलाकार और निर्देशक दोनों रूप में प्रगति व विवेक पाण्डेय सफल रहे और उन्होंने नाटय प्रेमियों की भरपूर प्रशंसा बटोरी।

इस नाट्‌य समारोह के माध्यम से विवेचना रंगमंडल ने दर्शकों के लिए एक नया प्रयोग भी किया। प्रयोग के रूप में दर्शकों को टिकट पहले से उपलब्ध करवा दी गर्इ और उनके अनुरोध किया गया कि वे समारोह स्थल में अपनी इच्छा व क्षमतानुसार सहयोग राशि  को एक डिब्बे में डाल दें। इस प्रक्रिया को दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला और उन्होंने उत्साह से सहयोग राशि देने में कोर्इ हीला-हव्वाली नहीं की। विवेचना रंगमंडल के निदेशक अरूण पाण्डेय इसे दर्शकों की परिपक्वता के रूप में देखते हैं। संजय उपाध्याय के साथ-साथ समारोह में शामिल हुए सभी नाट्‌य निर्देशकों ने दर्शकों की इस बात के लिए सराहना की कि जबलपुर का दर्शक अच्छा रंगकर्म देखने के साथ टिकट खरीद कर नाटक देखने वाले दर्शकों के रूप में देश में सबसे आगे है।

विवेचना रंगमंडल ने रंग परसार्इ-2013 के माध्यम से देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों में आयोजित होने वाले नाटय समारोह में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। हिंदी के साथ अन्य भाषार्इ राज्यों के रंग निर्देशकों की इच्छा है कि अपनी प्रस्तुतियों के साथ भविष्य के नाट्‌य समारोह में शामिल हों।


    

पीवी राजगोपाल को अन्ना हजारे से अलग, स्वयं का अस्तित्व बनाए रखने की सलाह


केरल में जन्मे गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल गांधी शांति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष और एकता परिषद के प्रमुख हैं . एकता परिषद की स्थापना वर्ष १९९१ में की गई थी . राजगोपाल ने वर्धा स्थित सेवाग्राम से कृषि का अध्ययन करने के बाद ७० के दशक में चंबल के डाकुओं के समर्पण और पुनर्वास में सक्रिय भूमिका निभाई . कथकली का नृत्य का प्रशिक्षण ले चुके राजगोपाल की पत्नी कनाडा मूल की जिल कार हैरिस हैं. जिल कार हेरिस भारत भ्रमण के साथ साथ सहकारिता , आदिवासी उत्पीडन और जल -जंगल - ज़मीन से जुड़े मामलों के अध्यन के लिए आईं थी . पी वी राजगोपाल के साथ इन क्षेत्रों में काम करते उन्हें लगा कि राजगोपाल अपने आंदोलन के प्रति तन मन से ईमानदार हैं , तभी उन्होंने राजगोपाल की जीवन संगिनी बनने का फैसला किया और तभी से वे उतनी ही ईमानदारी से राजगोपाल के हर कदम पर उनके साथ रहती हैं. 
राजगोपाल के मुताबिक एकता परिषद एक अहिंसक सामाजिक आंदोलन है, जो राष्ट्रीय स्तर पर गरीब और भूमिहीन लोगों के लिए भूमि अधिकारों की मांग कर रहा है। भूमि सुधार वन अधिकारों की मांग को ले कर राजगोपाल ने २००७ में भी ग्वालियर से दिल्ली तक २५ हजार लोगों के साथ यात्रा की थी . तब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय भूमि आयोग का गठन किया . इसके प्रमुख खुद प्रधानमंत्री थे, लेकिन सरकार निष्क्रिय ही बनी रही। इसी निष्क्रियता और दुराग्रह के खिलाफ राजगोपाल के साथ हजारों भूमिहीन फिर से जनसत्याग्रह पर ३ अक्टूबर २०१२ को ग्वालियर से निकले . यह मार्च जब आगरा पह्नुचने को था तभी केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश आगरा पहुंच गए और पीवी राजगोपाल से पैदल मार्च को समाप्त करने का आग्रह किया. श्री रमेश ने हजारों आदिवासी पदयात्रियों को भरोसा दिलाया कि यदि वर्तमान मंत्रालय में मैं ६ माह रह पाया तो उनकी सभी मांगों का न्याय संगत निराकरण कर दूंगा. उनके इस वायदे का अभी तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है. आदिवासी अपने को एक बार फिर ठगा सा महसूस कर रहे हैं लेकिन श्री राजगोपाल के रहते उनका यह जनसत्याग्रह अनुशासन और संयम का पर्याय बन गया। इस अनुशासन और संयम के पीछे राजगोपाल का ऐसे ही मार्च निकालने का लंबा अनुभव है। वे वर्ष २००७ के पहले करीब दस राज्य स्तरीय पदयात्राएं निकाल चुके हैं. श्री राजगोपाल पिछले दिनों जबलपुर आये. उन्होंने अपने आंदोलन के बारे में श्रोताओं से विस्तार से चर्चा की और अपनी चिंता से अवगत कराया.

प्राकृतिक संसाधनों का स्थानांतरण जल, जंगल और जमीन का स्थानांतरण हो रहा है . गांव से शहर की ओर पलायन, इससे शहर में भी स्थिति नारकीय हो गई. आम आदमी के लिए कोई सुविधा नहीं है. गांव से पलायन के कारण किसान आत्महत्या करने लगे हैं और इसकी संख्या निरंतर बढ़ रही है . इससे हिंसा भी बढ़ी और नक्सलवाद का फैलाव हुआ. विकास पर पुनर्विचार होना चाहिए. ग्रामीण भारत में अपराधीकरण का फैलाव हुआ . आदिवासियों और जमीन देने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है। खनन करने वाले जमीन हथिया कर लाभ कमा रहे हैं। हिंसा को बढ़ाने वाले विकास पर चिंतन करने की जरूरत है। सरकारी कर्मियों में संवेदनहीनता आम बात हो गई है . पहले ऐसी प्रवृत्ति छोटे कर्मियों या तहसीलदार तक थी, अब कलेक्टर या आईएएस में यह बात देखने को मिल रही है.

आईएएस जनसुनवाई का नाटक कर रहे हैं और नियंत्रण भी कर रहे हैं। इन लोगों का मुख्य उद्देश्य बड़ी व मल्टीनेशनल कंपियों को जमीन दिलवाना भर रह गया है। गांधी जी के स्वावलंबन की अवधारणा के स्थान पर परावलंबन की भावना विकसित हो रही है. सरकार की योजनाओं जैसे वृद्धावस्था पेंशन, नरेगा, विकलांग पेंशन जैसी योजना से आम आदमी कामचोर होता जा रहा है.

पीवी राजगोपाल ने इन विसंगतियों या प्रक्रिया से लड़ने के लिए अहिंसात्मक तरीके से जूझने की बात की. उन्होंने कहा कि गरीबों की ताकत, नव जवानों की ताकत, अहिंसक ताकत, सहभागिता की ताकत को इस्तेमाल करने की सलाह दी. पीवी राजगोपाल ने महत्वपूर्ण बात यह कही कि " चुप्पी और हिंसा के बीच खड़े हो कर अहिंसक विरोध करें."

पीवी राजगोपाल ने संबोधन के पश्चात प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि वे अन्ना हजारे के आंदोलन में किसी मतभेद के कारण नहीं, बल्कि पदयात्रा में व्यस्त होने के शामिल नहीं हुए. उन्होंने यह अवश्य कहा कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन की असफलता का मुख्य कारण उसमें शामिल मध्यम वर्ग का टिकाऊपन न होना था. पीवी राजगोपाल ने कहा कि मध्यम वर्ग की आंधी जरूरी और आवश्यक है, लेकिन उसका टिकाऊपन भी जरूरी है. आंदोलन में आदिवासियों, शोषित, महिलाओं को शामिल किया जाएगा, जो आंदोलन को टिकाऊ बनाएंगे.

कार्यक्रम में आमतौर पर पीवी राजगोपाल को यह सलाह दी गई कि वे अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन से अपने को अलग रखें एवं स्वयं और संस्था का अस्तित्व बना कर आगे का रास्ता तय करें. पीवी राजगोपाल के लंबे समय से सहयोगी संतोष भारती ने भी उन्हें स्वयं का अस्तित्व अलग रख कर चलने की सलाह दी और अन्ना के साथ किसी भी प्रकार का गठजोड़ न करने की अपील की.
    

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