31 जुलाई को तुलसी जयंती थी। जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक तुलसी सप्ताह पूरे ...
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  1. युग तुलसी रामकिंकर का जबलपुर से क्या संबंध है
  2. कौन थे घमंडी महाराज जिनके नाम से जबलपुर के एक चौक का नाम घमंडी पड़ा
  3. गुरू दत्त, कागज़ के फूल और जबलपुर के सिनेमाघर
  4. उनके कंधे पर अंतिम समय तक टंगा रहा कैमरा
  5. जबलपुर की सुभाष टॉकीज और जय संतोषी मां
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युग तुलसी रामकिंकर का जबलपुर से क्या संबंध है

31 जुलाई को तुलसी जयंती थी। जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक तुलसी सप्ताह पूरे देश में मनाया जाता है।

रामचरित मानस पढ़ कर तुलसीदास की कल्पना की जा सकती है, लेकिन युग तुलसी की उपाध‍ि से विभूषि‍त रामकिंकर जी को लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है और उनसे रामकथा और उसकी व‍िभि‍न्न व्याख्या को सुना है। रामकिंकर जी का जबलपुर से गहरा नाता है। जबलपुर से ही उन्होंने रामकथा सुनाना शुरु की थी।

रामकिंकर जी के पिताजी पंडित श‍िव नायक उपाध्याय मूल रूप से मिर्जापुर जिले के बरैनी गांव के रहने वाले थे लेकिन उन्होंने जबलपुर को अपना ठिकाना बना लिया था। रामकिंकर जी का जन्म जबलपुर में हुआ। वर्ष 2006 में प्रकाशि‍त उनकी एक पुस्तक के अनुसार जन्मतिथि 1 नवम्बर 1924 है। जबलपुर के नुनहाई क्षेत्र में प्रेमलाल अग्रवाल (सराफ) का निवास स्थान था। यहीं उनकी फर्म सेठ प्रेमलाल गुलाबचंद सराफ थी। यह दुकान 1920 में स्थापित हुई थी। प्रेमलाल सराफ के आवास के एक हिस्से में रामकिंकर जी के पिता पंडित श‍िव नायक उपाध्याय रहा करते थे। दोनों परिवार के बीच परस्पर मधुर संबंध थे। उनके संबंध को देख कर ऐसा अहसास होता था कि सभी एक बड़े परिवार के सदस्य हों। उनके बीच संबंध की मधुरता किस तरह की थी उसका अंदाज इस बात से पता चलता है कि जब पंडित श‍िव नायक उपाध्याय कभी बाहर जाते थे, तब वे पुत्र रामकिंकर को कह जाते थे कि जरूरत पड़ने पर वे प्रेमलाल सराफ या उनके पुत्र वल्लभदास अग्रवाल से पैसे मांग सकते हैं। रामकिंकर जी प्रेमलाल अग्रवाल को अपना बब्बा ही मानते थे और वल्लभदास को बड़ा भाई। रामकिंकर जी को प्रेमलाल अग्रवाल से पैसा लेने में संकोच होता था, तो वे कोश‍िश करते कि उनका सामना बड़े भैया यानी कि प्रेमलाल अग्रवाल से न हो। दरअसल प्रेमलाल अग्रवाल पैसा मांगने का कारण पूछते थे। वहीं वल्लभदास जी जिन्हें रामकिंकर भैया जी का संबोधन देते थे वे बिना कुछ पूछे उनकी जरूरत के मुताबिक तुरंत पैसे दे देते थे।

रामकिंकर जी ने जबलपुर के पंडित लोकनाथ संस्कृत विद्यालय में संस्कृत का अध्ययन किया, लेकिन उनकी औपचारिक शि‍क्षा किसी स्कूल या कॉलेज में नहीं हुई थी। रामकिंकर जी पढ़ाई लिखाई में अत्यंत साधारण थे। रामायण के व्याख्याकार पिता पंडित श‍िव नायक उपाध्याय का प्रभाव रामकिंकर जी पर पड़ा और उन्होंने उनके संस्कार भी ग्रहण किए।

प्रेमलाल अग्रवाल के आवास के आंगन में दस बीस लोगों की उपस्थिति में रामकिंकर जी की रामकथा की शुरुआत हुई। खैरागढ़ में पिता पंडित शिव नायक उपाध्याय कथा सुनाने गए थे लेकिन वे अचानक अस्वस्थ हो गए। पिता जी ने रामकिंकर जी को आदेश दिया कि वे वहां मौजूद जन समूह को कथा सुनाएं। रामकिंकर जी ने पंडित जी का आदेश माना और उस समय जो शुरुआत हुई वह एक इतिहास बन गई।

जबलपुर में रामकिंकर जी की कथा व प्रवचन घर, मोहल्ले, हितकारिणी कन्या विद्यालय, डिसिल्वा स्कूल, सराफा चौक जैसे स्थानों में होते थे। यहां जन सामान्य ही कथा सुनने आता था। एक बार रामकिंकर जी की रामकथा का आयोजन राइट टाउन में महापौर पंडित भवानी प्रसाद तिवारी के निवास स्थान में हुआ। यहां शहर का प्रबुद्ध वर्ग बड़ी संख्या में पहुंचा। इसके बाद जबलपुर में रामकिंकर जी की रामायण व्याख्या में समाज के भद्र वर्ग की उपस्थिति शतप्रतिशत होने लगी।

अग्रवाल (सराफ) परिवार से रामकिंकर जी की प्रगाढ़ता के कई किस्से हैं। रामकिंकर जी प्रेम लाल अग्रवाल की पत्नी मताई बाई को अपनी माँ मानते थे। मताई बाई ममतामयी थीं। वे परिवार के बच्चों के साथ बाल रामकिंकर जी को भी अत्यंत स्नेह से भोजन करवाती थीं। वल्लभदास की बड़ी पुत्र वधु शील अग्रवाल (डा. प्रह्लाद अग्रवाल की पत्नी) हिन्दी में एमए थीं। उन्होंने रामकिंकर की कई पुस्तकों की पाण्डुलिपि तैयार करने और सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रामकिंकर जी की पुस्तक का काम बाद में कानपुर में होने लगा। रामकिंकर जी की इच्छा थी कि वहां भी इसकी जिम्मेदारी शील अग्रवाल ही संभाले लेकिन परिवार के दायित्व के कारण यह संभव नहीं हुआ। वहां पुस्तक का काम शीला कोचर ने संभाला। वल्लभदास के बड़े पुत्र डा.प्रह्लाद अग्रवाल के पुत्र का नाम श्रीकांत रामकिंकर जी ने रखा था। अग्रवाल परिवार के अधिकांश बच्चों का नामकरण भी रामकिंकर जी ने ही किया था।

अग्रवाल परिवार रामकिंकर जी को पहले पंडित जी से संबोधित करता था और बाद में यह धीरे धीरे महाराज में परिवर्तित हो गया।

जब रामकिंकर जी जबलपुर में थे तब ही गुरू शिष्य परम्परा शुरु हो गई थी। जबलपुर में रघुनाथ प्रसाद तिवारी युग तुलसी के प्रथम शिष्य बने। रघुनाथ प्रसाद तिवारी प्रेमलाल गुलाबचंद सराफ फर्म का कारोबार संभालते थे।

प्रतिवर्ष तुलसी जयंती आती रहेगी और हम लोगों को यानी कि जबलपुर शहर को याद आते रहेंगे रामकिंकर जी। 🔷

(फोटो में सामने बाएं ओर रामकिंकर जी व दाएं ओर भवानी प्रसाद तिवारी बैठे हैं। भवानी प्रसाद तिवारी के पीछे दाएं ओर लुकमान और प्रेमलाल अग्रवाल परिवार के वल्लभदास जी, गोकुलदास जी, डा. प्रह्लाद अग्रवाल व जगदीश प्रसाद जी। भवानी प्रसाद तिवारी की बाएं ओर नीचे की तरफ रघुनाथ प्रसाद तिवारी बैठे हैं।)
   

कौन थे घमंडी महाराज जिनके नाम से जबलपुर के एक चौक का नाम घमंडी पड़ा

जबलपुर में वैसे तो कई चौक हैं लेकिन लार्डगंज थाना से बड़ा फुहारा मार्ग के बीच में सिर्फ एक चौराहा है जिसे सब लोग घमंडी चौक के नाम से जानते व पहचानते हैं। जिस स्थान पर घमंडी चौक है वहीं 14 अगस्त 1942 को गुलाब सिंह 16 साल की उम्र में शहीद हुए थे। वर्तमान में जब भी आजादी के किस्से सुनाए और छापे जाते हैं जिक्र आता है कि गुलाब सिंह घमंडी चौक पर शहीद हुए थे। जब यह घटना हुई थी तब उस स्थान का नाम घमंडी चौक प्रचलन में नहीं आया था।   

      यह वही घमंडी चौक है जहां राजनेता शरद यादव देवा मंगोड़े वाले के यहां बैठकी करते थे। शरद यादव राष्ट्रीय क्ष‍ितिज पर चमकने लगे थे लेकिन जब भी वे जबलपुर आते तब वे एक बार जरूर देवा मंगोड़े वाले के यहां मंगोड़े खाते थे। जबलपुर के मूल वाश‍िन्दों के अलावा बाहर के लोगों के मन में यह उत्सुकता रहती है कि चौक वह भी घमंडी नाम का। इसकी कहानी सिंचाई विभाग में मुख्य अभ‍ियंता के पद पर कार्यरत रहे एमजी चौबे ने सुनाई। 

चौबे परिवार में सन् 1918 में यह स्थिति बनी कि महिला के नाम पर केवल उनकी दादी कौशल्या चौबे ही शेष रहीं। परिवार के नाम पर एक अविवाहित देवर, दो पुत्र स्वयं के, एक पहली पत्नी का और दो एक अन्य देवर के थे। इस प्रकार पांच बच्चों का लालन-पालन चौबे परिवार की दादी ने किया। जबलपुर के उपनगर खमरिया के पास झिरिया गाँव में सभी सम्मिलित रहते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जमीन आदि सरकार ने खमरिया फैक्ट्री के निर्माण के लिए अधिग्रहित कर ली। मजबूरन परिवार को जबलपुर आना पड़ा। परिवार जबलपुर में घने बसे दीक्ष‍ितपुरा में रहने लगा। एमजी चौबे के पिताजी के चचेरे भाई थे चेतराम चौबे व घनश्याम दास चौबे। सभी पाँचों भाईयों को पहलवानी का बेहद शौक था। 

घनश्याम दास चौबे भी पहलवानी करते थे और जीवन भर अविवाहित रहे। वे बचपन से ही सदैव हड़बड़ी व जल्दबाजी रहते थे। चौबे परिवार की दादी की बात किसी ने सुनी होगी तो उसके अनुसार घनश्याम चौबे जब भोजन करने बैठते तो उंगलियों से तबला बजाते रहते थे और भोजन के लिए ‘’जल्दी करो.....कितनी देर और लगेगी’’ जैसे वाक्य लगातार बोलते रहते थे। उनकी इस आदत के कारण दादी उनको घमंडी कहकर बुलाती थीं। धीरे-धीरे घर में और उन्हें जानने पहचानने वाले लोग उन्हें घमंडी के संबोधन से पुकारने लगे। घनश्याम चौबे जब युवा हुए और वयस्कता की ओर कदम बढ़ाने लगे तब लोगों ने उन्हें घमंडी महाराजका संबोधन दिया। 

 घनश्याम चौबे उर्फ घमंडी महाराज ने चौक के नजदीक बड़ा फुहारा के ओर अग्रवाल होजि‍यरी के बाजू में सूर्य विजय होटल खोल ली और उसका संचालन करने लगे। तब तक लोगों ने घनश्याम चौबे कहना छोड़ दिया था उनका नाम ही घमंडी हो गया। उनके नाम के कारण चौक या चौराहा का नाम घमंडी चौक पड़ गया और जो एक बार नाम पड़ा और अब तक लोगों की जुबान पर है। चौबे परिवार के बच्चे उन्हें घम्मी कक्का कहते थे। 

घनश्याम चौबे उर्फ घम्मी कक्का उर्फ घमंडी महाराज का निवास महाकौशल स्कूल के पीछे था। उनके मकान के चार ब्लाक थे। एक में खुद रहते थे और शेष तीन में किरायेदार। घमंडी महाराज कभी मुंबई गए होंगे तो वहां से एक अनाथ बच्चे को ले आए। वही उनकी देखभाल करता था। उसका नाम उन्होंने बद्री रखा था। चौबे परिवार की दादी बद्री नाम का संबोधन कभी नहीं करती थी। दरअसल चौबे परिवार के दादा जी यानी कि दादी के पति का नाम बद्री प्रसाद चौबे था। बच्चा बद्री अच्छा नर्तक था। बच्चों की फरमाइश पर उस समय प्रचलित जंगली फिल्म के गाने आईय या सुकू शुकू .. करू मैं क्या सुकू सुकू ... हो गया दिल मेरा सुकू सुकू.... कोई मस्ताना कहे कोई दीवाना कहे  कोई परवाना कहे, जलने को बेकरार....चाहत का मुझ पे असर मैं दुनिया से बेखबर...चलता हूं अपनी डगर...मंजिल है मेरी प्यार पर शानदार डांस करता था। 

घमंडी महाराज का वर्ष 1961 में अस्थमा के कारण निधन हो गया। उनके निधन के उपरांत घमंडी महाराज की सारी संपत्ति उनके सगे बड़े भाई, शेखर चौबे के पिता चेतराम चौबे को विरासत में मिली। विरासत में एक मोटर साइकिल भी मिली थी एजेएस। उसकी पेट्रोल टंकी पर गियर का लीवर लगा था। 

घमंडी महाराज के परिवार के रामेश्वर चौबे सुबह से शाम तक सुपर मार्केट काफी हाउस में मौजूद रहते हैं। काफी हाउस एक तरह से अव‍िवाहित रामेश्वर चौबे का घर जैसा ही है। काफी हाउस के तमाम कार्मिक उनका ख्याल रखते हैं। उनकी बड़ी मूंछे बरबस काफी हाउस में आने वालों का ध्यान आकर्ष‍ित कर लेती है। रामेश्वर चौबे भी किसी महाराज से कम नहीं हैं। 

घमंडी महाराज को गुजरे पचास साल बीत गए लेकिन घमंडी चौक से लाखों लोग गुजरते हैं किसी को याद नहीं आती और न ही याद आते हैं घनश्याम चौबे उर्फ घम्मी कक्का उर्फ घमंडी महाराज।🔷


    


   

गुरू दत्त, कागज़ के फूल और जबलपुर के सिनेमाघर

 

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक व अभ‍िनेता गुरू दत्त का आज 9 जुलाई को जन्मदिन है। इस प्रकार आज से गुरू दत्त के जन्म शताब्दी वर्ष की शुरुआत हो रही है। गुरू दत्त को उनकी फिल्म कागज के फूल, प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम, चौदहवीं का चांद के कारण याद किया जाता है। कागज़ के फूल पहली भारतीय सिनेमास्कोप फिल्म और गुरू दत्त द्वारा आधिकारिक रूप से निर्देशित अंतिम फ़िल्म है। कागज़ के फूल में गुरू दत्त के साथ वहीदा रहमान मुख्य भूमिका में थीं। कागज़ के फूल जबलपुर के सिनेमाघरों में प्रदर्शन के रोचक किस्से हैं। इन किस्सों का पूरा श्रेय एम्पायर टॉकीज के मैनेजर रहे दुर्गा प्रसाद (डीपी) बाजपेयी को है।
1959 में जब कागज़ के फूल रिलीज हुई तो यह जबलपुर के श्रीकृष्णा टॉकीज में प्रदर्श‍ित हुई। उस समय फिल्म का विषय लोगों को पसंद नहीं आया और यह कहानी जबलपुर में दोहराई गई। पांच-सात दिन में ही फिल्म उतर गई और इसे जबलपुर के अंदरून इलाके की सुभाष टॉकीज में स्क्रीन मिली। यहां भी कागज़ के फूल मुश्किल से चार-पांच दिन ही चल पाई। जबलपुर में कागज़ के फूल जलगांव के वसंत पिक्चर्स के जरिए डिस्ट्रीब्यूट हुई थी।

दो टॉकीजों में असफल प्रदर्शन के बाद कागज़ के फूल को अपनी टॉकीज में लगाने का निर्णय जबलपुर के पॉश क्षेत्र में स्थित डिलाइट टॉकीज के प्रबंधन ने लिया। एम्पायर के साथ डिलाइट टॉकीज में प्राय: अंग्रेजी फिल्में प्रदर्श‍ित होती थीं। सिनेमा के शौकीन चौंक गए। उन लोगों को समझ में नहीं आया कि डिलाइट टॉकीज में गुरू दत्त की फिल्म कागज़ के फूल को दो टॉकीज में उतारने के बाद पुन: लगाने का निर्णय क्यों लिया गया? खैर कागज़ के फूल डिलाइट टॉकीज में लगी। इसका प्रदर्शन कैसा रहा इसकी जानकारी देने के पूर्व यह जान लेना भी मुनासिब होगा कि उस समय यानी कि पांचवे दशक से छठे दशक तक जबलपुर में टॉकीजों में सिर्फ दो शो में ही फिल्म का प्रदर्शन होता था। पहला शो शाम को 6 से 9 का दूसरा शो 9-12 का रहता था। शनिवार व रविवार को कोई भी फिल्म मेटिनी शो में भी चलती थी।

डिलाइट टॉकीज में कागज़ के फूल पुन: लगाई गई। आप लोगों को आश्चर्य होगा कि डिलाइट टॉकीज में इस फिल्म ने श्रीकृष्णा व सुभाष टॉकीज की कुल टिकट ख‍िड़की से ज्यादा की कमाई की। लोग चकित रह गए। वैसे कागज़ के फूल डिलाइट टॉकीज में लगभग एक सप्ताह से ज्यादा तक चली। डीपी बाजपेयी ने इसकी वजह बताई कि डिलाइट टॉकीज में फिल्म देखने वाला दर्शकों का वर्ग अलग तरह का था।

उस समय जबलपुर में जनसंख्या के हिसाब से हिन्दी फिल्मों के दर्शक सिर्फ एक-दो फीसदी थे। वहीं रीजनल यानी की क्षेत्रीय सिनेमा के दर्शकों की संख्या आबादी की दृष्टि‍ से 10 फीसदी तक रहती थी। यदि तमिल फिल्म प्रदर्श‍ित होती थी तो उस समय जबलपुर में रहने वाला पूरा तमिल समुदाय फिल्म को परिवार के साथ देखने ज़रूर जाता था। एम्पायर व डिलाइट टॉकीज में प्रदर्श‍ित होने वाले रीजनल सिनेमा का अपना जलवा होता था।

जैसा कि पूर्व में बताया गया कि कागज़ के फूल प्रथम भारतीय सिनेमास्कोप फिल्म थी इसलिए फिल्म की रील के साथ डिस्ट्रीब्यूटर फिल्म प्रोजेक्शन के लिए सिनेमास्कोप के लेंस भेजते थे। एम्पायर व डिलाइट टॉकीज में प्राय: अंग्रेजी फिल्में लगती थीं और यह सिनेमास्कोप में रहती थी इसलिए दोनों टॉकीजों के पास स्वयं के सिनेमास्कोप लेंस हुआ करते थे। बाद के दिनों में एम्पायर टॉकीज प्रबंधन ने एक और लेंस खरीद लिया।

जबलपुर की टॉकीजों से जलगांव के डिस्ट्रीब्यूटर वसंत पिक्चर्स का गहरा संबंध रहा है। इसके मालिक चंदनमल लुंकड़ थे। बताया जाता है कि लुंकड़ परिवार का उस समय के लक्ष्मी बैंक के संचालन से नाता था। वसंत पिक्चर्स शुरु से श्रीकृष्णा व सुभाष टॉकीज किराये से चलाते थे। वसंत पिक्चर्स सीपी-बरार क्षेत्र के डिस्ट्रीब्यूटर थे। डिस्ट्रीब्यूटर और किराये से श्रीकृष्णा व सुभाष टॉकीज चलाने के कारण कागज़ के फूल इन सिनेमाघरों में लगी थी।

1980 के दशक में कागज़ के फूल फिल्म को एक कल्ट क्लासिक के रूप में पुनर्जीवित किया गया। इस बार भी डिस्ट्रीब्यूटर जलगांव के वसंत पिक्चर्स थे। एम्पायर टॉकीज के मैनेजर डीपी बाजपेयी कागज़ के फूल को एम्पायर टॉकीज में इसे रि-रिलीज करने का निर्णय लिया। वसंत पिक्चर्स और एम्पायर टॉकीज के बीच एग्रीमेंट हुआ जिसमें कागज़ के फूल को तीन-चार सप्ताह लगाने का जिक्र था। एम्पायर टॉकीज के मैनेजर डीपी बाजपेयी ने लौटती डाक से एग्रीमेंट भेजा लेकिन उसमें सुधार कर लिखा गया कि तीन-चार दिन तक फिल्म चलाने के लिए सहमत हैं। खैर बात यहां आकर सहमत हुई कि जितने भी दिन होगा कागज़ के फूल एम्पायर टॉकीज में चलेगी। एम्पायर टॉकीज में दोपहर 12 बजे के सिंगल शो में कागज़ के फूल को लगाया गया। फिल्म चली खूब चली। कहां बात सिर्फ तीन-चार दिन की थी कागज़ के फूल एम्पायर टॉकीज में चार सप्ताह तक चली। खूब कलेक्शन आया। दर्शकों ने कागज़ के फूल को खूब प्यार दिया। इससे पूर्व एम्पायर टॉकीज में गुरू दत्त की प्यासा भी रि-रिलीज में खूब चली थी। कागज़ के फूल फिल्मको भारत में बनी अब तक की सबसे बेहतरीन आत्म-चिंतनशील फिल्म माना जाता है।

वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया...
बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
एक राह पर चलके दो क़दम
वक़्त ने किया...
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम
वक़्त ने किया...

डीपी बाजपेयी का कहना है कि जगत और जीवन का सत्य ही था- कागज़ के फूल।
   

उनके कंधे पर अंतिम समय तक टंगा रहा कैमरा

आज सुबह यानी कि 4 जुलाई 2025 को जिस प्रकार बरसात हो रही है वह मीडिया के लिए आज व कल सुर्खी ज़रूर बनेगी। घर के भीतर से बाहर देखते हुए गत दिवस दिवंगत हुए नितिन पोपट का चेहरा याद आने लगा। याद आने लगे वह दृश्य जब छायाकार नितिन पोपट ज्यादा बरसात में जबलपुर के उन निचले इलाकों में जहां पानी भरा रहता था वहां पेंट घुटने तक मोड़ कर अपने कैमरे में तस्वीर कैद करने लगते थे। जबलपुर की ठेठ बोली में लिखें तो वे दिलेर, दबंग, स्पष्टवादी, मेहनत से खींची गई अपनी फोटो को अखबार में जगह दिलाने के लिए मुठभेड़ करने वाले व्यक्ति थे। वे अपनी फोटो को अखबार में छपवाने के लिए अखबार के संपादकीय कर्मियों व संपादक से बहस तक कर लेते थे। नितिन पोपट ने प्रेस फोटोग्राफी कभी व्यावसायिक रूप से नहीं की। सातवें दशक से 2017 तक वे छायांकन एक मिशन के रूप में करते रहे। व‍िभ‍िन्न घटनाओं की फोटो लेकर वे जबलपुर के सभी अखबारों को निस्वार्थ रूप से भेज देते थे। कैमरा का बेग उनके कंधे से कभी उतरा नहीं। बाद के दिनों में जब उन्होंने फोटोग्राफी करना छोड़ दिया तब भी कैमरा उनके कंधे पर लटकता रहता था। नितिन पोपट अपने साथ काम करने वाले छायाकार को गुरू मंत्र के रूप में यही संदेश देते थे कि कंधे पर कैमरा हर समय टंगे रहना चाहिए। नितिन पोपट के जीवन में कैमरे के अलावा दूसरी चीज नहीं छूटी वह उनकी मोपेड थी। लम्बे समय तक सुवेगा मोपेड में बैठकर वे जबलपुर की सड़कों पर फोटो की तलाश में घूमते रहे। बाद में यह सुवेगा मोपेड को उन्होंने छायाकार मदन सोनी को दे दी और नई मोपेड ले ली। मोपेड के अलावा वे कभी दूसरे वाहन में नहीं चले। 


नितिन पोपट प्रेस फोटोग्राफी करते रहे इसलिए उनकी फोटोग्राफी में छायांकन का सौन्दर्य तो नहीं रहता था लेकिन तत्कालिकता, सजग दृष्ट‍ि, न्यूज सेंस उनका अद्भुत था। वे फोटोग्राफी सौन्दर्य के जबर्दस्त पक्षधर थे, इसलि‍ए जबलपुर की रानी दुर्गावती कला वीथि‍का में लगने वाली प्रत्येक फोटो प्रदर्शनी में पहुंचने वाले वे पहले व्यक्ति होते थे। नितिन पोपट अपने से पूर्व व बाद की पीढ़ी के छायाकार शश‍िन् यादव, हरि महीधर, रजनीकांत यादव, डा. जेएस मूर्ति के छायांकन की प्रशंसा करते थे और इन सबको खूब सम्मान देते थे।


विल्स सिगरेट का कश लेने के शौकीन और कड़क काफी पीने वाले नितिन पोपट ने जयंती टॉकीज (पूर्व में प्लाजा) के सामने अपने आफ‍िस व हर्षा प्रिंटर के डॉर्क रूम में किसी को प्रविष्ट नहीं होने दिया। ब्लेक एन्ड व्हाइट फोटोग्राफी के समय में नितिन पोपट स्वयं डॉर्क रूप में काम करना पसंद करते थे। वे फोटो की प्रोसेसिंग व डेव्लपिंग स्वयं करते थे। उनके सहायकों को इस बात की जानकारी नहीं रहती थी कि कौन सी फोटो उस समय नवभारत, नवीन दुनिया, देशबन्धु या युगधर्म में छपने के लिए भेजी जाएगी। नितिन पोपट फोटोग्राफी में इतने रम गए थे कि उन्हें अपने हर्षा प्रिंटर की कभी कोई ध्यान नहीं रहा। कम मात्रा या परिमाण में उनका विश्वास नहीं था इसलिए वे फिल्म के रोल और फोटो को प्रिंट करने के पेपर बड़ी संख्या में आर्डर करते थे। जिस समय ऑफसेट प्रिटिंग का चलन नहीं था तब स्वयं जेब से खर्च करके फोटो के ब्लॉक बनवाते और प्रेस में देकर आते थे। इस सदाशयता में उनकी हर्षा प्रिंटर सर्वाध‍िक रूप से प्रभावित हुई। यह भी दुख की बात है कि नितिन पोपट ने जिन अखबारों को फोटो उपलब्ध कराने के लिए दिन रात एक किया और आंधी बरसात की चिंता नहीं कि उन्होंने नितिन पोपट को एक्र‍िड‍िएशन या मान्यता प्रदान करने वाली एक अदद चिठ्ठी देने में कभी रुचि नहीं दिखाई। नितिन पोपट जिंदगी भर एक्र‍िड‍िएशन प्राप्त करने के लिए परेशान रहे।   


छायाकार नितिन पोपट को जबलपुर की एक पहचान व ब्रांड भी कहा जा सकता है। जब भी जबलपुर में  राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, कला क्षेत्र की कोई विभूति जबलपुर आती थी तब उसकी मुलाकात नितिन पोपट से अवश्य होती थी। यदि विभूति का पहली बार जबलपुर आगमन होता था, तो दूसरी बार जबलपुर आने पर उनकी निगाह नितिन पोपट को ज़रूर दूंढ़ती थी। राष्ट्रीय स्तर की सैकड़ों विभूतियों से नितिन पोपट के व्यक्तिगत संबंध थे। कवि नीरज से नितिन पोपट की प्रगाढ़ता जग जाहिर थी। ब्रांड के रूप में नितिन पोपट इसलिए याद आते हैं क्योंकि जब उनका श‍िखर था तब बहुत से लोग नवभारत में फोटो क्रेडिट में उनका नाम देखकर विवाह समारोह में फोटो खींचने के लिए सम्पर्क करते थे। कई लोग नितिन पोपट का पता पूछते हुए जयंती टॉकीज के सामने हर्षा प्रिंटर पहुंच जाते थे। इस प्रकार का कार्य उन्होंने किया लेकिन बहुत कम। 


जबलपुर के मीडिया में छायाकारों की दूसरी पंक्ति तैयार करने में नितिन पोपट का सबसे बड़ा योगदान है। नितिन पोपट के मार्गदर्शन में बसंत मिश्रा, सुगन जाट, पप्पू शर्मा, तापस सूर, अनिल तिवारी, पंकज पारे जैसे छायाकार उभरे और उन्होंने अपना व‍िश‍िष्ट स्थान बनाया। सुगन जाट तो नितिन पोपट के डॉर्क रूम में काम करके खींची गई फोटो को अपनी कला से छायांकन की दृष्ट‍ि से दर्शनीय व सुंदर बना देते थे।  


नितिन पोपट को दिवंगत होने के बाद याद करने के कई कारण हैं। पहला तो नई पीढ़ी उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती और दूसरा उनके जैसे लोग जबलपुर में लगातार कम होते जा रहे हैं। नितिन पोपट के whatsapp प्रोफाइल में एक कोटेशन था-‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’। वाकई में नितिन पोपट हर फ्रि‍क को धुएं में उड़ाते रहे और इसे उड़ाते हुए संसार से चले गए। श्रद्धांजलि 🔷

   

जबलपुर की सुभाष टॉकीज और जय संतोषी मां

आज 30 मई का दिन पूरे देश और खासतौर से जबलपुर से भी जुड़ा हुआ है। ठीक 50 साल पहले 30 मई 1975 को जबलपुर सहित पूरे देश में एक फिल्म जय संतोषी मां रिलीज हुई थी। इसी साल शोले और दीवार फिल्में भी रिलीज हुईं थी। शोले तो सर्वाधि‍क कमाई करने वाली फिल्म में उस समय दर्ज हुई लेकिन जय संतोषी मां कमाई करने में नंबर पर रही थी। इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन की दीवार से भी अध‍िक पैसा कमाया था। इस दृष्ट‍ि से जय संतोषी मां को 50 साल बाद भी सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण माना जाता है। 1975 में यह फिल्म जबलपुर की सुभाष टॉकीज में रिलीज हुई थी। 1950 के शुरुआती समय में सुभाष टॉकीज का निर्माण हुआ था। इसके संचालक सेठ गोविन्द दास व त्र‍िभुवन दास मालपाणी जैसे नगर के समृद्ध लोग थे। सुभाष टॉकीज जबलपुर की पुरानी रिहाइश में लोकप्रिय थी। उस समय सुभाष टॉकीज की छवि धार्मिक फिल्मों के छविगृह के रूप में ज्यादा रही। संत तुकाराम, हर हर महादेव या सामाजिक फिल्में प्राय: यहां लगती थीं।


1975 में जब शोले जैसी फिल्में जबलपुर के मध्य स्थित श्रीकृष्णा टॉकीज में तो दीवार ज्योति टॉकीज में लगी तब जय संतोषी मां को सुभाष टॉकीज में स्थान मिला। शोले व दीवार के सामने जनता और तो और टॉकीज वाले भी भूल गए कि जय संतोषी मां जैसी कोई फिल्म जबलपुर में लगी है। एक दो दिन तक कोई हलचल नहीं हुई लेकिन जैसे ही चार पांच दिन बीते कि लोगों खासतौर से महिलाओं का हुजूम सुभाष टॉकीज की ओर निकलने लगा।

सुभाष टॉकीज मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गई। टॉकीज के आसपास के लोगों ने अगरबत्ती, गुड़ चना, नारियल से लेकर पूजन सामग्री बेचने लगे। महिलाएं चप्पल उतार कर टॉकीज में फिल्म देखती थीं। टॉकीज के अलावा आसपास जूते चप्पल रखने की व्यवस्था की गई। फिल्म में जब भी संतोषी माता की महिमा का गुणगान होता, दर्शक जेब से रेजगारी निकाल निछावर करना शुरू कर देते। फिल्म में संतोषी मां की भूमिका निभाने वाली अनिता गुहा वास्तविक जीवन में देवी के रूप में पूजने लगीं। वे जहां भी निकलती लोग उनके दर्शन के लिए लपक पड़ते। महिलाएं अपने बच्चे उनकी गोद में आशीर्वाद पाने के लिए डाल देते।

सुभाष टॉकीज पूरे महाकोशल अंचल में चर्चित हो गई। जबलपुर के आसपास के शहरों-कस्बों से लोग जय संतोषी मां देखने के लिए आने लगे। फिलम देखने वाले चप्पल उताकर कर सिनेमाघरों में प्रवेश करते। अपने साथ वे फूल-माला लेकर आते और फिल्म शुरू होते ही जब दूसरे ही सीन में संतोषी मां की आरती होती तो सब अपनी-अपनी आरती जलाकर आरती करना शुरू कर देते। फिल्म खत्म होने के बाद बाकायदा सिनेमाघरों के बाहर प्रसाद बंटता और पास में ही लंबी कतार दिखती, संतोषी मां की फ्रेम की हुई फोटो के साथ शुक्रवार की व्रत कथा बेचने वाले दुकानदारों की दुकान तेजी से चलने लगी। जय संतोषी मां का ऐसा आशीर्वाद रहा कि टॉकीज से जुड़े और इसके आसपास रहने वाले सभी लोग मालदार हो गए। सबसे अध‍िक टॉकीज के संचालक मालामाल हुए।

जय संतोषी मां में अनिता गुहा ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जबकि सहायक भूमिका में आशीष कुमार, कानन कौशल, त्रिलोक कपूर थे। देश भक्ति गीत लिखने वाले प्रदीप ने गीत लिखे थे और सी. अर्जुन ने फिल्म का संगीत दिया था। 'यहां-वहां, जहां-तहां, मत पूछो कहां-कहां, हैं संतोषी मां, अपनी संतोषी मां गीत लोगों को आज भी याद है। खुद कवि प्रदीप ने फिल्म में दो गाने गाए।

जय संतोषी मां फिल्म के बाद शुक्रवार को तब चाट की दुकान की तरफ देखना भी कितना बड़ा गुनाह होता था और जो बच्चा गलती से शुक्रवार को खटाई खा भी ले, वह बेचारा हफ्तों तक इसी अपराध-ग्लानि में जीता रहता कि घर पर कहीं कुछ अशुभ न हो जाए। लोगों के घरों पर खूब पोस्टकार्ड आते। इन पोस्टकार्ड पर ऐसे ही 16 पोस्टकार्ड और लिखकर दूसरों को भेजने को कहा जाता और फिर यह चेन चलती ही रहती। हालात यहां तक आ गए थे कि डाकखानों में पोस्टकार्ड की मांग ज्यादा हो गई और आपूर्ति कम पड़ने लगी।

इस फिल्म से दूसरी धारणा यह भी टूटी कि आमतौर पर फिल्मों के दर्शक पुरुष ज्यादा है लेकिन इस फिल्म देखने वालों में महिलाओं की तादाद सबसे ज्यादा थी। अचरज इस बात का भी है इस फिल्म से पहले संतोषी माता के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते थे। इस फिल्म की कहानी, गीत-संगीत ने जनोन्माद पैदा कर दिया। एक किस्म का धार्मिक पुनर्जागरण दिखाई दिया था। जय संतोषी मां फिल्म सिर्फ 12 लाख रूपए में बनी और इसने 25 करोड़ रूपए से ज्यादा कमाया। बताया जाता है कि सुभाष टॉकीज में जय संतोषी मां 25 सप्ताह से ऊपर तक चली।

जबलपुर में सुभाष टॉकीज को जब भी याद किया जाता है तो यह कहकर कि वही टॉकीज जिसमें जय संतोषी मां लगी थी। सुभाष टॉकीज से लोगों की याद से जुड़ी हुई हैं। नब्बे के दशक में जब सिंगल स्क्रीन बंद होना शुरु हुए तब सुभाष टॉकीज को इसके संचालकों ने बेच दिया और अब वहां एक मार्केट बन गया।


पुनश्च-सुभाष टॉकीज के बारे में लिखा जाते वक्त टॉकीज की फोटो दूंढ़ने का खूब प्रयास किया गया। इसके तत्कालीन संचालकों के वंशजों से फोटो की तहकीकात की गई। हर जगह निराशा ही मिली। पत्रकार सत्यम तिवारी के प्रयास से जबलपुर के प्रथम फिल्म पोस्टर व बैनहर बनाने वाले 'कुमार साहब' के पुत्र राजेश सालुंके से बातचीत हुई। कुमार साहब व उनके पुत्र मोहम्मद रफी के अनन्य भक्त। कुमार साहब ने छठे दशक में जबलपुर में रफी साहब को जबलपुर बुलाया था। राजेश सालुंके ने सुभाष टॉकीज की पुरानी फोटो कुमार साहब के संग्रह से उपलब्ध कराई। सत्यम तिवारी व राजेश सालुंके को आभार और कुमार साहब को श्रद्धांजलि।
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